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डॉ. मुकुन्द रविदास की तीन कविताएं: विधवा की बेटी, लोग और उसी कमरे में

डॉ. मुकुन्द रविदास की तीन कविताएं: विधवा की बेटी, लोग और उसी कमरे में

विधवा की बेटी जीर्ण-शीर्ण वस्त्र सेलिपटी गुड़ियाबहुत सुंदर दिखती है। पड़ोसी घर खटती-पिटती ‘माँ’वह गुड्डा-गुड़िया खेलती हैरात को माँ से लिपट करखटिया में सोयी रहती है। दिन में खेत को जातीरात में शौच को निकलती हैउठवा लो एक दिनहवस का शिकारबना लोतन-मन कर दोजीर्ण-शीर्णबहुत सुंदर दिखती है। एक नहीं दो-चारबुला लोकोई हाथ पकड़ लोकोई पैर दबा लोचिखेगी-चिल्लाएगीमुँह में डाल दो...

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डॉ. मुकुन्द रविदास की तीन कविताएं: विधवा की बेटी, लोग और उसी कमरे में

डॉ. मुकुन्द रविदास की तीन कविताएं: विधवा की बेटी, लोग और उसी कमरे में

विधवा की बेटी जीर्ण-शीर्ण वस्त्र सेलिपटी गुड़ियाबहुत सुंदर दिखती है। पड़ोसी घर खटती-पिटती ‘माँ’वह गुड्डा-गुड़िया खेलती हैरात को माँ से लिपट करखटिया में सोयी रहती है। दिन में खेत को जातीरात में शौच को निकलती हैउठवा लो एक दिनहवस का शिकारबना लोतन-मन कर दोजीर्ण-शीर्णबहुत सुंदर दिखती है। एक नहीं दो-चारबुला लोकोई हाथ पकड़ लोकोई पैर दबा लोचिखेगी-चिल्लाएगीमुँह में डाल दो...

विनोद कुमार राज ‘विद्रोही’ की 3 कविता: भेड़िए, सवाल और मेरी कविताएं

विनोद कुमार राज ‘विद्रोही’ की 3 कविता: भेड़िए, सवाल और मेरी कविताएं

भेड़िए भेड़िए-तुम फिर आनाबार-बार आनादबोच कर ले जानायहां का नूरयहां की महकयहां की नमींयहां की जन्नतपेड़, पहाड़, जंगल, झरनानदी, नाला, पनघट सब ले जानापसंद की पनिहारनियों को भी ले जाना। भेड़िए-तुम फिर आनाले जाना दबोच करयहां के लोकगीतयहां के लोकनृत्ययहां की संपदा, खान-खनिजधर्म, वेद, पुराण, शास्त्र, सब ले जानालोगों का मन, मस्तिष्क, ईमान सब ले जाना भेड़िए-तुम फिर आनाअबकी बारबदल...

भीष्म साहनी के कथाकर्म में साम्प्रदायिकता

भीष्म साहनी के कथाकर्म में साम्प्रदायिकता

किसी भी समाज को समझने में उस वक्त का साहित्य और उसका इतिहास मदद करते हैं। भीष्म साहनी के साहित्य की पड़ताल करने पर भी हमें समाज का एक चेहरा दिखाई पड़ता है। आज के पर्चे के विषय के बहाने, भीष्म जी के साहित्य के बहाने हम उनके वक्त के समाज की पड़ताल करेंगे, जिन जख्मों की लीपापोती हो चुकी...

भारतीय रेल: बिंब प्रतिबिंब

भारतीय रेल: बिंब प्रतिबिंब

अंग्रेजी की इस किताब का नाम है ‘द बॉय हू लव्ड ट्रेन’। दीपक सपरा ने रेलवे की मैकनिकल डिपार्टमेंट में एक अधिकारी के रूप में नौकरी शुरू की स्पेशल क्लास रेलवे अप्रेंटिस परीक्षा के तहत। आपको बता दें प्रतिवर्ष इस परीक्षा में मुश्किल से 20 बच्चे 12वीं के बाद संघ लोक सेवा आयोग द्वारा चुने जाते हैं। आईआईटी परीक्षा से...

पुस्तक समीक्षा  ▏  एक गोंड गांव में जीवन: वेरियर एल्विन

पुस्तक समीक्षा ▏ एक गोंड गांव में जीवन: वेरियर एल्विन

भारतीय जनजातियों पर शोध करने वाले मानवशास्त्रियों में वेरियर एल्विन (1902-64) का विशिष्ट स्थान है। वे काफी लोकप्रिय हुए और कई मामलों में विवादास्पद भी रहें। मुरिया जनजाति पर उनका शोध ‘मुरिया एंड देयर घोटुल’ विश्व स्तर पर चर्चित हुआ। उनकी पद्धति से कुछ लोगों को असहमति भी रही है, खासकर ‘काम’ सम्बन्धों के नियमन के उनके चित्रण को लेकर।...

विनोद कुमार राज ‘विद्रोही’ की 3 कविताएं: भूख का इतिहास, आओ बचाएं और गांव की औरतें

विनोद कुमार राज ‘विद्रोही’ की 3 कविताएं: भूख का इतिहास, आओ बचाएं और गांव की औरतें

भूख का इतिहास चलो-शिनाख्त करते हैंभूख कोकैसा होता है उसका रूपकैसा होता है उसका रंगकैसी होती है उसकी महककैसी होती है उसकी प्रतिबद्धताकैसी होती है उसकी वैचारिकताक्या वह दिखता है पिज्जा-बर्गर की तरहक्या वह दिखता है माड़-भात की तरहक्या वह दिखता है रोटी-साग की तरहकहां रहता है वहक्या भिखारियों के कटोरे मेंक्या झोपड़ियों के कोने मेंक्या हवेलियों के बड़े से...

पुस्तक समीक्षा: विनोद कुमार राज ‘विद्रोही’ की पुस्तक ‘जी साहेब जोहार’

पुस्तक समीक्षा: विनोद कुमार राज ‘विद्रोही’ की पुस्तक ‘जी साहेब जोहार’

विनोद कुमार राज ‘विद्रोही’ की पुस्तक ‘जी साहेब जोहार‘ रश्मि प्रकाशन लखनऊ से प्रकाशित हुई है। यह पुस्तक आते ही खूब सुर्खियां बटोर रही है। ऐसे तो कइयों ने इस पुस्तक की समीक्षा की है। किंतु हम यहां झारखंड के जाने-माने कवि, लेखक विजय कुमार संदेश, शंभु बादल और भारत यायावर की समीक्षा प्रकाशित कर रहे हैं। अपने समय का...

हरभजन सिंह मेहरोत्रा की कहानी: कुख्यात

हरभजन सिंह मेहरोत्रा की कहानी: कुख्यात

हरभजन सिंह मेहरोत्रा लेखक, कथाकार और प्रौद्योगिकविद् हैं। इन्होंने लेखन के साथ ‘रमतदीप’ पत्रिका का संपादन भी किया। उपन्यास ‘अनास जिन्दगी’ प्रकाशित, साहित्यकारों पर लिखे व्यक्ति चित्र ‘सफर के साथी’ का प्रकाशन 1988 में हुआ। तकनीकी अध्ययन से संबन्धित कई पुस्तकें प्रकाशित हुई। कई कहानियां प्रकाशित एवं पुरस्कृत। मेरे अन्दर दाखिल होते ही उसने उचटती नजरों से मुझे देखा था...

हबीब-उर-रहमान की कहानी: चोर की माँ

हबीब-उर-रहमान की कहानी: चोर की माँ

जब तेइसवां रोजा बीत गया तब उसे लगा कि अब देर हो रही है। हालाँकि, वह नहीं चाहता था कि इस बार ईद पर घर जाए। घर जाओ तो पचास तरह के झंझट, खासकर ट्रेन का टिकट लेना सबसे बड़ी मुसीबत का काम है। पहले लंबी लाइन में लगो और उसके कुछ ही सेकंड में रिज़र्वेशन फुल हो जाता है।...

मदर डे पर पढ़ें दिवंगत प्रेमरंजन भारती की कविता- माँ और मुक्ति

मदर डे पर पढ़ें दिवंगत प्रेमरंजन भारती की कविता- माँ और मुक्ति

दिवंगत प्रेमरंजन भारती विनोबा भावे विश्वविद्यालय में हिंदी विषय के असिस्टेंट प्रोफेसर थे। बीते दिनों कोरोना के कारण अकाल मृत्यु के शिकार हो गए। हिंदी साहित्य में उनकी गहरी रुचि थी। समकालीन युवा कविता के उभरते हुए हस्ताक्षर। मदर डे पर उनकी दो कविताएं यहां प्रस्तुत कर रहे हैं- माँ माँ हो तुम!माँ हो तुम यहीं आस-पाससहसा याद आ जाती...

मशहूर शायर, आलोचक और नाटककार शमीम हनफी नहीं रहे

मशहूर शायर, आलोचक और नाटककार शमीम हनफी नहीं रहे

जाने-माने शायर, आलोचक और नाटककार शमीम हनफी का निधन हो गया है। वे 82 साल के थे। कुछ दिनों पहले उन्हें कोरोना संक्रमण होने के बाद दिल्ली के डीआरडीओ अस्पताल में भर्ती कराया गया था। 4 मई को एनडीटीवी के पत्रकार और एंकर रवीश कुमार ने हनफी के लिए प्लाज्मा डोनेट करने की अपील की थी। उन्होंने सोशल मीडिया पर...

कोरोना ने हमसे एक और धरोहर छीन लिया, कवि और पत्रकार मनोज कुमार झा नहीं रहें

कोरोना ने हमसे एक और धरोहर छीन लिया, कवि और पत्रकार मनोज कुमार झा नहीं रहें

कवि लेखक और पत्रकार मनोज कुमार झा का आज रविवार दोपहर दिल्ली में कोरोना संक्रमण के बाद निधन हो गया। वे बहुत ही सरल स्वभाव के मालिक थे। कुछ भी कहा एक झटके में मान जाते थे। आज उनके यूं जाने से हमने ऐसे व्यक्ति को खोया है जो न केवल कवि लेखक और पत्रकार थे बल्कि बहुत ही अच्छा...

डॉ. नंदकिशोर नवल कविता की एक जीवंत पाठशाला

डॉ. नंदकिशोर नवल कविता की एक जीवंत पाठशाला

नवल जी के देहावसान की खबर स्वाभाविक रूप से दु:खद है, क्योंकि भौतिक रूप से उन्हें देखना अब संभव नहीं होगा। पिछले कुछ वर्षों से उनका स्वास्थ्य लगातार ख़राब चल रहा था और खबरों के अनुसार इस लॉकडाउन में वह घर में ही फिसल कर गिर भी पड़े थे, इसलिए कुछ अनहोनी की आशंका तो बनी हुई थी। 12 मई...

संस्मरण: नंदकिशोर नवल में भाषा का पाखंड या विद्वता के प्रदर्शन की कभी मंशा नहीं दिखी

संस्मरण: नंदकिशोर नवल में भाषा का पाखंड या विद्वता के प्रदर्शन की कभी मंशा नहीं दिखी

कल रात जब मेरे गुरु और हिंदी के वरिष्ठ आलोचक नंदकिशोर नवल के निधन की खबर आई तो मुझे अपने छात्र जीवन के उन दिनों की याद आई जब हम मानते थे कि नवल जी तो कभी बूढ़े भी नहीं हो सकते। उनका व्यक्तित्व ही ऐसा था। उन दिनों वह किसी हीरो की तरह दिखते थे। वैसे भी वे विद्यार्थियों...

मजदूरों और कोरोना पर गुलज़ार की नज़्में- मिलेंगे तो वहां जाकर, जहां जिंदगी है

मजदूरों और कोरोना पर गुलज़ार की नज़्में- मिलेंगे तो वहां जाकर, जहां जिंदगी है

जाने-माने गीतकार, लेखक और फिल्म निर्देशक गुलज़ार सामाजिक मुद्दों पर हमेशा बेबाकी से अपनी राय रखते हैं। वे अक्सर नज़्मों, गीतों और कविताओं के जरिए अपने जज्बात को बयां करते हैं। मौजूदा कोरोना संकट और लॉकडाउन की वजह से मजदूरों के पलायन पर भी उन्होंने अपनी संवेदनाएं व्यक्त की हैं। उन्होंने अपनी दो मार्मिक नज़्मों के जरिए मजदूरों की दुर्दशा...

हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद के ख़िलाफ़ थे रामधारी सिंह दिनकर

हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद के ख़िलाफ़ थे रामधारी सिंह दिनकर

रामधारी सिंह दिनकर के सम्बन्ध में लगभग एक स्थापना-सी बन चुकी है कि वे थोड़े-थोड़े सबको अच्छे लगते हैं। उनमें राष्ट्रवाद के भी तत्व हैं, गांधीवाद और मार्क्सवाद के भी तत्व हैं। दिनकर के प्रायः आलोचक उन्हें थोड़ा गांधीवादी भी मानते हैं और थोड़ा मार्क्सवादी भी, थोड़ा राष्ट्रवादी भी और थोड़ा हिंदूवादी भी। संभवतः उनके मूल्यांकन की इसी प्रवृत्ति के...

सरोज कुमारी की तीन कविताएं

सरोज कुमारी की तीन कविताएं

सरोज कुमारी: एम.ए, एम.फिल, पी-एचडी (दिल्ली विश्वविद्यालय) विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित। ‘निराला का गद्य साहित्य’, ‘राम की शक्तिपूजा का रचना-विधान’, ‘छायावादी कविता और राम की शक्तिपूजा’ और ‘स्त्री लेखन का दूसरा परिदृश्य’ पुस्तकें प्रकाशित। दिल्ली विश्वविद्यालय के विवेकानंद महाविद्यालय में सहायक प्राध्यापक। दहलीज दहलीज के भीतरएक अदृश्य लक्ष्मण रेखा से बंधे मेरे पांवसदियों से पी रहे हैं तालाबंदी का...

रामधारी सिंह दिनकर के राष्ट्रवाद को निगलना चाहता है हिंदुत्व राष्ट्रवाद

रामधारी सिंह दिनकर के राष्ट्रवाद को निगलना चाहता है हिंदुत्व राष्ट्रवाद

रामधारी सिंह दिनकर की ‛राष्ट्रवाद’ संबंधी समझ को दृढ़ता के साथ रेखांकित करने की जरूरत है क्योंकि हिंदुत्ववादी शक्तियां उनकी राष्ट्रीय भावों की ओजपूर्ण कविताओं के सहारे अपने अंधराष्ट्रवाद के अभियान को साधना चाहती हैं। यह अकारण नहीं है कि हिमालय के शिखरों पर चढ़कर उनकी कविताओं के ‛आलाप’ किए जा रहे हैं। ऐसा संभवतः इसलिए किया जा रहा है...

साहित्य में नायक की पारंपरिक अवधारणा बदल दी प्रेमचंद ने

साहित्य में नायक की पारंपरिक अवधारणा बदल दी प्रेमचंद ने

मुझे पिछले वर्ष भी हाजीपुर के इस गांधी आश्रम में आने का मौका मिला था। हाजीपुर की सबसे अच्छी बात ये है कि यहां हमेशा प्रेमंचद जयंती दो तीन दिनों के बाद मनाई जाती है। वैसे भी 31 जुलाई को हर जगह प्रेमचंद जयंती कार्यक्रमों की धूम मची रहती है। पूरे बिहार में छोटी-छोटी जगहों, कस्बों व विश्वविद्यालयों में इतनी...

आलोचना का लोकधर्म: आलोचना की लोकदृष्टि

आलोचना का लोकधर्म: आलोचना की लोकदृष्टि

बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी शाकिर अली कवि, आलोचक, एक्टिविस्ट कई रूपों में दिखाई देते हैं। लेकिन इन सब में मुझे उनका विद्यार्थी रूप सर्वाधिक महत्वपूर्ण लगता है। ज्ञान की भूख और किताबों से उनका प्रेम, उनको निकट से जानने वाले ही जान सकते हैं।

राही मासूम रज़ा की चिंता के केंद्र में है हिंदुस्तान की साझी संस्कृति

राही मासूम रज़ा की चिंता के केंद्र में है हिंदुस्तान की साझी संस्कृति

राही मासूम रज़ा के सबसे बड़े आलोचक प्रो0 कुँवर पाल सिंह से मिलने अलीगढ़ जाना चाहता था। उनसे मिलना सिर्फ इसलिए नहीं चाहता था कि वे राही मासूम रज़ा के सबसे बड़े आलोचक हैं बल्कि इसलिए भी कि वे उनके सबसे अच्छे दोस्त रहे हैं। राही मासूम रज़ा ने 1966 ई0 में सबसे पहला और सबसे चर्चित हिंदी उपन्यास ‘आधा...

प्रेमचंद की कहानी: हज-ए-अक्बर

प्रेमचंद की कहानी: हज-ए-अक्बर

(1) मुंशी साबिर हुसैन की आमदनी कम थी और ख़र्च ज़्यादा। अपने बच्चे के लिए दाया रखना गवारा नहीं कर सकते थे। लेकिन एक तो बच्चे की सेहत की फ़िक्र और दूसरे अपने बराबर वालों से हेटे बन कर रहने की ज़िल्लत इस ख़र्च को बर्दाश्त करने पर मजबूर करती थी। बच्चा दाया को बहुत चाहता था। हर दम उसके...

अदनान बिस्मिल्लाह की कहानी: और रज़िया भाग गई

अदनान बिस्मिल्लाह की कहानी: और रज़िया भाग गई

अदनान बिस्मिल्लाह: 12 मई 1977 को बनारस में जन्म। एम.फिल, पी.एच.डी. जामिया मिल्लिया इस्लामिया और पी.जी.डी. मास मीडिया जामिया मिल्लिया इस्लामिया से। 6 वर्षों तक दूरदर्शन में कार्य। विगत 15 वर्षों से रंगकर्मी के रूप में सक्रीय। ‘खानम’ धारावाहिक दूरदर्शन, उर्दू में नायक एवं सह-निर्देशक। पटकथा लेखन, विभिन्न कहानियों का नाट्य रूपान्तरण तथा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कहानी और कविताएं प्रकाशित।...

हिंदी और उर्दू में फ़र्क़ है इतना, वो ख़्वाब देखते हैं हम देखते हैं सपना

हिंदी और उर्दू में फ़र्क़ है इतना, वो ख़्वाब देखते हैं हम देखते हैं सपना

(संवाद-स्थलः लोदी बागान के एक भुरभुरे मक़बरे की सीढ़ियां, मौसम बहार का। एक सुहानी शाम )। उर्दू: संवाद शुरू करने से पहले क्यों न इसकी कुछ सीमाएं या शर्ते तय कर लें। हिंदी: ज़रूर, वर्ना बात बिखर जायेगी या एक भद्दी, भारी और बासी बहस में बदल जायेगी। उर्दू: तो पहली शर्त तो यही कि हम इस संवाद के दौरान...