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युद्ध और शांति पर बर्टोल्ट ब्रेख्त की आठ कविताएं

युद्ध और शांति पर बर्टोल्ट ब्रेख्त की आठ कविताएं

भूखों की रोटी भूखों की रोटी हड़प ली गई हैभूल चुका है आदमी मांस की शिनाख्तव्यर्थ ही भुला दिया गया है जनता का पसीना।जय पत्रों के कुंज हो चुके हैं साफ।गोला बारूद के कारखानों की चिमनियों सेउठता है धुआं। लड़ाई का कारोबार एक घाटी पाट दी गई हैऔर बना दी गई है एक खाई। युद्ध जो आ रहा है युद्ध...

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युद्ध और शांति पर बर्टोल्ट ब्रेख्त की आठ कविताएं

युद्ध और शांति पर बर्टोल्ट ब्रेख्त की आठ कविताएं

भूखों की रोटी भूखों की रोटी हड़प ली गई हैभूल चुका है आदमी मांस की शिनाख्तव्यर्थ ही भुला दिया गया है जनता का पसीना।जय पत्रों के कुंज हो चुके हैं साफ।गोला बारूद के कारखानों की चिमनियों सेउठता है धुआं। लड़ाई का कारोबार एक घाटी पाट दी गई हैऔर बना दी गई है एक खाई। युद्ध जो आ रहा है युद्ध...

सआदत हसन मंटो की कहानी ‘टोबाटेक सिंह’

सआदत हसन मंटो की कहानी ‘टोबाटेक सिंह’

बटवारे के दो-तीन साल बाद पाकिस्तान और हिंदोस्तान की हुकूमतों को ख़्याल आया कि अख़लाक़ी क़ैदियों की तरह पागलों का तबादला भी होना चाहिए यानी जो मुसलमान पागल, हिंदोस्तान के पागलख़ानों में हैं उन्हें पाकिस्तान पहुंचा दिया जाये और जो हिंदू और सिख, पाकिस्तान के पागलख़ानों में हैं उन्हें हिंदोस्तान के हवाले कर दिया जाये। मालूम नहीं ये बात माक़ूल...

गोपाल राम गहमरी की कहानी: गुप्तकथा

गोपाल राम गहमरी की कहानी: गुप्तकथा

पहली झाँकी जासूसी जान पहचान भी एक निराले ही ढंग की होती है। हैदर चिराग अली नाम के एक धनी मुसलमान सौदागर का बेटा था। उससे जासूस की गहरी मिताई थी। उमर में जासूस से हैदर चार पाँच बरस कम ही होगा, लेकिन शरीर से दोनों एक ही उमर के दीखते थे। मुसलमान होने पर भी हैदर जैसे और मुसलमान...

मन्नू भंडारी की कहानी- स्त्री सुबोधिनी

मन्नू भंडारी की कहानी- स्त्री सुबोधिनी

प्यारी बहनो, न तो मैं कोई विचारक हूँ, न प्रचारक, न लेखक, न शिक्षक। मैं तो एक बड़ी मामूली-सी नौकरीपेशा घरेलू औरत हूँ, जो अपनी उम्र के बयालीस साल पार कर चुकी है। लेकिन उस उम्र तक आते-आते जिन स्थितियों से मैं गुजरी हूँ, जैसा अहम अनुभव मैंने पाया… चाहती हूँ, बिना किसी लाग-लपेट के उसे आपके सामने रखूँ और...

ख़्वाजा अहमद अब्बास की कहानी: दिवाली के तीन दीये

ख़्वाजा अहमद अब्बास की कहानी: दिवाली के तीन दीये

पहला दीया दीवाली का ये दीया कोई मामूली दीया नहीं था। दीये की शक्ल का बहुत बड़ा बिजली का लैम्प था। जो सेठ लक्ष्मी दास के महलनुमा घर के सामने के बरामदे में लगा हुआ था। बीच में ये दीयों का सम्राट दीया था और जैसे सूरज के इर्द-गिर्द अन-गिनत सितारे हैं, इसी तरह इस एक दीये के चारों तरफ़...

अली सरदार जारी की कहानी: चेहरु माँझी

अली सरदार जारी की कहानी: चेहरु माँझी

हवा बहुत धीमे सुरों में गा रही थी, दरिया का पानी आहिस्ता-आहिस्ता गुनगुना रहा था। थोड़ी देर पहले ये नग़्मा बड़ा पुर-शोर था लेकिन अब उसकी तानें मद्धम पड़ चुकी थीं और एक नर्म-ओ-लतीफ़ गुनगुनाहट बाक़ी रह गई थी। वो लहरें जो पहले साहिल से जा कर टकरा रही थीं, अब अपने सय्याल हाथों से थके हुए साहिल का जिस्म...

हिंदी परंपरा के आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा को आप कितना जानते हैं?

हिंदी परंपरा के आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा को आप कितना जानते हैं?

डॉ. रामविलास शर्मा के महत्व का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि उनके आलोचनात्मक लेखन के प्रारंभिक दौर (चालीस के दशक) से लेकर आज उनके निधन के बीस वर्ष बाद तक वे बहस के केंद्र में हैं। इधर, नामवर जी के निधन पर और रेणु के जन्म शताब्दी पर भी उनके लिखे पर वाद-विवाद होते रहे...

आर. के. कश्यप की दो कविताएं- ओस की बूंदें और वीआईपी

आर. के. कश्यप की दो कविताएं- ओस की बूंदें और वीआईपी

ओस की बूंदें सुबह के ओस की बूँदों का छुअन, निश्छल प्रेम का अहसास कराती है।यह कोमल, निराकार, मासूम, अत्ममिलन का सुकून देती है। सुबह कि बेला में ज़मीन पर उगे छोटे-छोटे घासों पर,आपका इंतज़ार करती है। वृक्ष के पत्तों से टपकती कहती है,कि आओ हमसे आत्ममिलन करो। अहसास करो प्रेम के चरम स्पर्श का,आओ मैं तुममें समाहित होने को...

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की वैचारिक दृष्टि

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की वैचारिक दृष्टि

रामधारी सिंह दिनकर के दृष्टिकोण को परस्पर दो प्रमुख विचारधाराओं के परिप्रेक्ष्य में रखकर समझा जा सकता है। उनके दृष्टिकोण का पहला ध्रुव मार्क्सवाद है और दूसरा ध्रुव गांधीवाद है। वे विचारधाराओं के इन्हीं दो ध्रुवों के बीच आजीवन आवाजाही करते रहे हैं। अनेक अवसरों पर गांधी से उनकी असहमतियां भी प्रकट हुई हैं, इसलिए उनकी अनेक कविताओं में गांधी...

जयंती विशेष: समय की सलीबों पर राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’

जयंती विशेष: समय की सलीबों पर राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’

मौजूदा समय में दिनकर की ‛राष्ट्रवाद’ संबंधी समझ को दृढ़ता के साथ रेखांकित करने की जरूरत है क्योंकि हिंदुत्ववादी शक्तियां उनकी राष्ट्रीय भावों की ओजपूर्ण कविताओं के सहारे अपने अंधराष्ट्रवाद के अभियान को साधना चाहती हैं। यह अकारण नहीं है कि हिमालय के शिखरों पर चढ़कर उनकी कविताओं के ‛आलाप’ किए जा रहे हैं। ऐसा संभवतः इसलिए किया जा रहा...

अमृता प्रीतम के जन्मदिन पर पढ़ें उनकी पंजाबी कहानी: यह कहानी नहीं

अमृता प्रीतम के जन्मदिन पर पढ़ें उनकी पंजाबी कहानी: यह कहानी नहीं

पत्थर और चूना बहुत था, लेकिन अगर थोड़ी-सी जगह पर दीवार की तरह उभरकर खड़ा हो जाता, तो घर की दीवारें बन सकता था। पर बना नहीं। वह धरती पर फैल गया, सड़कों की तरह और वे दोनों तमाम उम्र उन सड़कों पर चलते रहे….। सड़कें, एक-दूसरे के पहलू से भी फटती हैं, एक-दूसरे के शरीर को चीरकर भी गुज़रती...

पुस्तक समीक्षा ❙ बर्नियर की भारत यात्रा : सत्रहवीं सदी का भारत

पुस्तक समीक्षा ❙ बर्नियर की भारत यात्रा : सत्रहवीं सदी का भारत

प्रसिद्ध यात्री फ्रांस्वा बर्नियर फ्रांस का निवासी था। पेशे से चिकित्सक बर्नियर 1656 से 1668 तक भारत में रहा। इस समय वृहत्तर भारत के अधिकांश क्षेत्रों में मुगलों का शासन था जिसमें अत्यधिक उथल-पुथल मचा था। शाहजहाँ के अस्वस्थ होने से उसके पुत्रों के बीच सत्ता प्राप्ति के लिए संघर्ष शुरू हो गया था। शाहजहाँ के चारो पुत्रों दारा शिकोह,...

डॉ. नंदकिशोर नवल कविता की एक जीवंत पाठशाला

डॉ. नंदकिशोर नवल कविता की एक जीवंत पाठशाला

नवल जी के देहावसान की खबर स्वाभाविक रूप से दु:खद है, क्योंकि भौतिक रूप से उन्हें देखना अब संभव नहीं होगा। पिछले कुछ वर्षों से उनका स्वास्थ्य लगातार ख़राब चल रहा था और खबरों के अनुसार इस लॉकडाउन में वह घर में ही फिसल कर गिर भी पड़े थे, इसलिए कुछ अनहोनी की आशंका तो बनी हुई थी। 12 मई...

संस्मरण: नंदकिशोर नवल में भाषा का पाखंड या विद्वता के प्रदर्शन की कभी मंशा नहीं दिखी

संस्मरण: नंदकिशोर नवल में भाषा का पाखंड या विद्वता के प्रदर्शन की कभी मंशा नहीं दिखी

कल रात जब मेरे गुरु और हिंदी के वरिष्ठ आलोचक नंदकिशोर नवल के निधन की खबर आई तो मुझे अपने छात्र जीवन के उन दिनों की याद आई जब हम मानते थे कि नवल जी तो कभी बूढ़े भी नहीं हो सकते। उनका व्यक्तित्व ही ऐसा था। उन दिनों वह किसी हीरो की तरह दिखते थे। वैसे भी वे विद्यार्थियों...

मजदूरों और कोरोना पर गुलज़ार की नज़्में- मिलेंगे तो वहां जाकर, जहां जिंदगी है

मजदूरों और कोरोना पर गुलज़ार की नज़्में- मिलेंगे तो वहां जाकर, जहां जिंदगी है

जाने-माने गीतकार, लेखक और फिल्म निर्देशक गुलज़ार सामाजिक मुद्दों पर हमेशा बेबाकी से अपनी राय रखते हैं। वे अक्सर नज़्मों, गीतों और कविताओं के जरिए अपने जज्बात को बयां करते हैं। मौजूदा कोरोना संकट और लॉकडाउन की वजह से मजदूरों के पलायन पर भी उन्होंने अपनी संवेदनाएं व्यक्त की हैं। उन्होंने अपनी दो मार्मिक नज़्मों के जरिए मजदूरों की दुर्दशा...

हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद के ख़िलाफ़ थे रामधारी सिंह दिनकर

हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद के ख़िलाफ़ थे रामधारी सिंह दिनकर

रामधारी सिंह दिनकर के सम्बन्ध में लगभग एक स्थापना-सी बन चुकी है कि वे थोड़े-थोड़े सबको अच्छे लगते हैं। उनमें राष्ट्रवाद के भी तत्व हैं, गांधीवाद और मार्क्सवाद के भी तत्व हैं। दिनकर के प्रायः आलोचक उन्हें थोड़ा गांधीवादी भी मानते हैं और थोड़ा मार्क्सवादी भी, थोड़ा राष्ट्रवादी भी और थोड़ा हिंदूवादी भी। संभवतः उनके मूल्यांकन की इसी प्रवृत्ति के...

सरोज कुमारी की तीन कविताएं

सरोज कुमारी की तीन कविताएं

सरोज कुमारी: एम.ए, एम.फिल, पी-एचडी (दिल्ली विश्वविद्यालय) विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित। ‘निराला का गद्य साहित्य’, ‘राम की शक्तिपूजा का रचना-विधान’, ‘छायावादी कविता और राम की शक्तिपूजा’ और ‘स्त्री लेखन का दूसरा परिदृश्य’ पुस्तकें प्रकाशित। दिल्ली विश्वविद्यालय के विवेकानंद महाविद्यालय में सहायक प्राध्यापक। दहलीज दहलीज के भीतरएक अदृश्य लक्ष्मण रेखा से बंधे मेरे पांवसदियों से पी रहे हैं तालाबंदी का...

रामधारी सिंह दिनकर के राष्ट्रवाद को निगलना चाहता है हिंदुत्व राष्ट्रवाद

रामधारी सिंह दिनकर के राष्ट्रवाद को निगलना चाहता है हिंदुत्व राष्ट्रवाद

रामधारी सिंह दिनकर की ‛राष्ट्रवाद’ संबंधी समझ को दृढ़ता के साथ रेखांकित करने की जरूरत है क्योंकि हिंदुत्ववादी शक्तियां उनकी राष्ट्रीय भावों की ओजपूर्ण कविताओं के सहारे अपने अंधराष्ट्रवाद के अभियान को साधना चाहती हैं। यह अकारण नहीं है कि हिमालय के शिखरों पर चढ़कर उनकी कविताओं के ‛आलाप’ किए जा रहे हैं। ऐसा संभवतः इसलिए किया जा रहा है...

आलोचना का लोकधर्म: आलोचना की लोकदृष्टि

आलोचना का लोकधर्म: आलोचना की लोकदृष्टि

बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी शाकिर अली कवि, आलोचक, एक्टिविस्ट कई रूपों में दिखाई देते हैं। लेकिन इन सब में मुझे उनका विद्यार्थी रूप सर्वाधिक महत्वपूर्ण लगता है। ज्ञान की भूख और किताबों से उनका प्रेम, उनको निकट से जानने वाले ही जान सकते हैं।

राही मासूम रज़ा की चिंता के केंद्र में है हिंदुस्तान की साझी संस्कृति

राही मासूम रज़ा की चिंता के केंद्र में है हिंदुस्तान की साझी संस्कृति

राही मासूम रज़ा के सबसे बड़े आलोचक प्रो0 कुँवर पाल सिंह से मिलने अलीगढ़ जाना चाहता था। उनसे मिलना सिर्फ इसलिए नहीं चाहता था कि वे राही मासूम रज़ा के सबसे बड़े आलोचक हैं बल्कि इसलिए भी कि वे उनके सबसे अच्छे दोस्त रहे हैं। राही मासूम रज़ा ने 1966 ई0 में सबसे पहला और सबसे चर्चित हिंदी उपन्यास ‘आधा...

प्रेमचंद की कहानी: हज-ए-अक्बर

प्रेमचंद की कहानी: हज-ए-अक्बर

(1) मुंशी साबिर हुसैन की आमदनी कम थी और ख़र्च ज़्यादा। अपने बच्चे के लिए दाया रखना गवारा नहीं कर सकते थे। लेकिन एक तो बच्चे की सेहत की फ़िक्र और दूसरे अपने बराबर वालों से हेटे बन कर रहने की ज़िल्लत इस ख़र्च को बर्दाश्त करने पर मजबूर करती थी। बच्चा दाया को बहुत चाहता था। हर दम उसके...

अदनान बिस्मिल्लाह की कहानी: और रज़िया भाग गई

अदनान बिस्मिल्लाह की कहानी: और रज़िया भाग गई

अदनान बिस्मिल्लाह: 12 मई 1977 को बनारस में जन्म। एम.फिल, पी.एच.डी. जामिया मिल्लिया इस्लामिया और पी.जी.डी. मास मीडिया जामिया मिल्लिया इस्लामिया से। 6 वर्षों तक दूरदर्शन में कार्य। विगत 15 वर्षों से रंगकर्मी के रूप में सक्रीय। ‘खानम’ धारावाहिक दूरदर्शन, उर्दू में नायक एवं सह-निर्देशक। पटकथा लेखन, विभिन्न कहानियों का नाट्य रूपान्तरण तथा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कहानी और कविताएं प्रकाशित।...

हिंदी और उर्दू में फ़र्क़ है इतना, वो ख़्वाब देखते हैं हम देखते हैं सपना

हिंदी और उर्दू में फ़र्क़ है इतना, वो ख़्वाब देखते हैं हम देखते हैं सपना

(संवाद-स्थलः लोदी बागान के एक भुरभुरे मक़बरे की सीढ़ियां, मौसम बहार का। एक सुहानी शाम )। उर्दू: संवाद शुरू करने से पहले क्यों न इसकी कुछ सीमाएं या शर्ते तय कर लें। हिंदी: ज़रूर, वर्ना बात बिखर जायेगी या एक भद्दी, भारी और बासी बहस में बदल जायेगी। उर्दू: तो पहली शर्त तो यही कि हम इस संवाद के दौरान...

तबस्सुम जहाँ की लघुकथा: विभाग का फैसला

तबस्सुम जहाँ की लघुकथा: विभाग का फैसला

[लेखिका तबस्सुम जहाँ दिल्ली स्थित केन्द्रीय विश्वविद्यालय जामिया मिल्लिया इस्लामिया से उच्च शिक्षा प्राप्त की हैं। फिर वहीं से एम.फिल और पीएच-डी. की डिग्री प्राप्त कीं। स्त्री और सामाजिक मुद्दों को लेकर काफी मुखर रही हैं। कई पत्रिकाओं और अखबारों में इनकी कहानियां तथा लघुकथा प्रकाशित हो चुकी है।] मिसेज वर्मा एक बड़े कॉलेज में विभागाध्यक्ष हैं। उनके कार्यकाल में...