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हबीब-उर-रहमान की कहानी: चोर की माँ

हबीब-उर-रहमान की कहानी: चोर की माँ

जब तेइसवां रोजा बीत गया तब उसे लगा कि अब देर हो रही है। हालाँकि, वह नहीं चाहता था कि इस बार ईद पर घर जाए। घर जाओ तो पचास तरह के झंझट, खासकर ट्रेन का टिकट लेना सबसे बड़ी मुसीबत का काम है। पहले लंबी लाइन में लगो और उसके कुछ ही सेकंड में रिज़र्वेशन फुल हो जाता है।...

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हबीब-उर-रहमान की कहानी: चोर की माँ

हबीब-उर-रहमान की कहानी: चोर की माँ

जब तेइसवां रोजा बीत गया तब उसे लगा कि अब देर हो रही है। हालाँकि, वह नहीं चाहता था कि इस बार ईद पर घर जाए। घर जाओ तो पचास तरह के झंझट, खासकर ट्रेन का टिकट लेना सबसे बड़ी मुसीबत का काम है। पहले लंबी लाइन में लगो और उसके कुछ ही सेकंड में रिज़र्वेशन फुल हो जाता है।...

मदर डे पर पढ़ें दिवंगत प्रेमरंजन भारती की कविता- माँ और मुक्ति

मदर डे पर पढ़ें दिवंगत प्रेमरंजन भारती की कविता- माँ और मुक्ति

दिवंगत प्रेमरंजन भारती विनोबा भावे विश्वविद्यालय में हिंदी विषय के असिस्टेंट प्रोफेसर थे। बीते दिनों कोरोना के कारण अकाल मृत्यु के शिकार हो गए। हिंदी साहित्य में उनकी गहरी रुचि थी। समकालीन युवा कविता के उभरते हुए हस्ताक्षर। मदर डे पर उनकी दो कविताएं यहां प्रस्तुत कर रहे हैं- माँ माँ हो तुम!माँ हो तुम यहीं आस-पाससहसा याद आ जाती...

मशहूर शायर, आलोचक और नाटककार शमीम हनफी नहीं रहे

मशहूर शायर, आलोचक और नाटककार शमीम हनफी नहीं रहे

जाने-माने शायर, आलोचक और नाटककार शमीम हनफी का निधन हो गया है। वे 82 साल के थे। कुछ दिनों पहले उन्हें कोरोना संक्रमण होने के बाद दिल्ली के डीआरडीओ अस्पताल में भर्ती कराया गया था। 4 मई को एनडीटीवी के पत्रकार और एंकर रवीश कुमार ने हनफी के लिए प्लाज्मा डोनेट करने की अपील की थी। उन्होंने सोशल मीडिया पर...

कोरोना ने हमसे एक और धरोहर छीन लिया, कवि और पत्रकार मनोज कुमार झा नहीं रहें

कोरोना ने हमसे एक और धरोहर छीन लिया, कवि और पत्रकार मनोज कुमार झा नहीं रहें

कवि लेखक और पत्रकार मनोज कुमार झा का आज रविवार दोपहर दिल्ली में कोरोना संक्रमण के बाद निधन हो गया। वे बहुत ही सरल स्वभाव के मालिक थे। कुछ भी कहा एक झटके में मान जाते थे। आज उनके यूं जाने से हमने ऐसे व्यक्ति को खोया है जो न केवल कवि लेखक और पत्रकार थे बल्कि बहुत ही अच्छा...

उर्दू के मशहूर कहानीकार राजिंदर सिंह बेदी की 1940 में लिखी कहानी: क्वारंटीन

उर्दू के मशहूर कहानीकार राजिंदर सिंह बेदी की 1940 में लिखी कहानी: क्वारंटीन

प्लेग और क्वारंटीन! हिमाला के पाँव में लेटे हुए मैदानों पर फैल कर हर एक चीज़ को धुंदला बना देने वाली कोहरे के मानिंद प्लेग के ख़ौफ़ ने चारों तरफ अपना तसल्लुत जमा लिया था। शहर का बच्चा बच्चा उसका नाम सुन कर काँप जाता था। प्लेग तो ख़ौफ़नाक थी ही, मगर क्वारंटीन उससे भी ज़्यादा ख़ौफ़नाक थी। लोग प्लेग...

मीरा मेघमाला की कविताएँ: सुगंध की गलियाँ, एक शव संस्कार, रोशनी और संगमरमर की कब्र

मीरा मेघमाला की कविताएँ: सुगंध की गलियाँ, एक शव संस्कार, रोशनी और संगमरमर की कब्र

मीरा मेघमाला मैसूर यूनिवर्सिटी से इतिहास में एम.ए.। इनकी कन्नड़, कोंकणी और हिन्दी में कविता, कहानी और लेख कई पत्र-पत्रिकाओं और वेब पोर्टल में प्रकाशित। इन्होंने कन्नड़ साहित्य क्षेत्र में ‘कादम्बिनी रावी’ नाम से 2014 से लिखना शुरू किया। इनके ‘हलगे मत्तु मेदुबेरळु’, ‘काव्य कुसुम’, ‘कल्लेदेय मेले कूत हक्कि’ कविता संकलन प्रकाशित। फिलहाल, कर्नाटक में महिला और बाल विकास डिपार्टमेंट...

सआदत हसन मंटो की कहानी: टू टू

सआदत हसन मंटो की कहानी: टू टू

मैं सोच रहा था, दुनिया की सबसे पहली औरत जब माँ बनी तो कायनात का रद्द-ए-अ’मल क्या था? दुनिया के सबसे पहले मर्द ने क्या आसमानों की तरफ़ तमतमाती आँखों से देख कर दुनिया की सब से पहली ज़बान में बड़े फ़ख़्र के साथ ये नहीं कहा था, “मैं भी ख़ालिक़ हूँ।” टेलीफ़ोन की घंटी बजना शुरू हुई। मेरे आवारा...

होली पर पढ़िए प्रेमचंद की कहानी: अंधेर

होली पर पढ़िए प्रेमचंद की कहानी: अंधेर

नागपंचमी आई, साठे के ज़िंदा-दिल नौजवानों ने ख़ुश रंग़ जांघिये बनवाए, अखाड़े में ढोल की मर्दाना सदाएँ बुलंद हुईं क़ुर्ब-ओ-जवार के ज़ोर-आज़मा इखट्टे हुए और अखाड़े पर तंबोलियों ने अपनी दुकानें सजाईं क्योंकी आज ज़ोर-आज़माई और दोस्ताना मुक़ाबले का दिन है औरतों ने गोबर से अपने आँगन लीपे और गाती-बजाती कटोरों में दूध-चावल लिए नाग पूजने चलीं। साठे और पाठे...

आज है महादेवी वर्मा का जन्मदिन, पढ़िए उनकी कहानी: बिबिया

आज है महादेवी वर्मा का जन्मदिन, पढ़िए उनकी कहानी: बिबिया

अपने जीवनवृत्त के विषय में बिबिया की माई ने कभी कुछ बताया नहीं, किन्तु उसके मुख पर अंकित विवशता की भंगिमा, हाथों पर चोटों के निशान, पैर का अस्वाभाविक लंगड़ापन देखकर अनुमान होता था कि उसका जीवन-पथ सुगम नहीं रहा। मद्यप और झगड़ालू पति के अत्याचार भी सम्भवतः उसके लिए इतने आवश्यक हो गए थे कि उनके अभाव में उसे...

प्रज्ञा मिश्र की चार कविताएं: कोहरा, सुख, मेसेंजर और प्रतीक्षा

प्रज्ञा मिश्र की चार कविताएं: कोहरा, सुख, मेसेंजर और प्रतीक्षा

कम्प्यूटर एप्लिकेशन में स्नातकोत्तर कवयित्री प्रज्ञा मिश्र मुम्बई के बोरीवली में रहती हैं। काव्यांकुर 7, काव्यचेतना साझा संग्रह, साहित्यनामा पत्रिका व अन्य डिजिटल प्लेटफार्म पर कविताएँ प्रकाशित। फिलहाल सूचना एंव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कार्यरत हैं। कोहरा ज़ीरो माइल से शुरुआत कीज़िन्दगी के अंजाने रास्तों परन धूप थी न गर्माहटघर में सीलन, तन में सिहरनसर्द साँसों में जमा मन भीघने...

नरेन सहाय की कविता: बारिश और नानी का गाँव

नरेन सहाय की कविता: बारिश और नानी का गाँव

नरेन सहाय का बचपन टीकमगढ़, मध्यप्रदेश के खेतों, बगीचों और जंगलों में गुजरा। जामिया मिलिया इस्लामिया से मास कम्युनिकेशन में स्नातकोत्तर की उपाधि अर्जित करने वाले सहाय राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की योजनाओं में फोटोग्राफी, वीडियो आर्ट, सिनेमा और प्रोडक्शन्स से जुड़े रहे हैं। विजुअल मीडियम के बतौर अतिथि शिक्षक जामिया में कार्यरत रहे हैं। वीर दी वेडिंग की फिल्म...

बिनोद कुमार राज ‘विद्रोही’ की कविता: तेरी भोंसड़ी के

बिनोद कुमार राज ‘विद्रोही’ की कविता: तेरी भोंसड़ी के

जी साहेब, जोहारसच कहता हूंमेरे दादा ने बताया था कियहाँ बहुत घनघोर जंगल हुआ करता थाआज से दुगुनाचारों ओर पहाड़ियों से घिरातब हमारे पूर्वजों नेजंगल के बीचों-बीचझाड़-झंझाड़-पुटुस को साफ किया थारहने लायक झोपड़ी बनाया थाजमीन को भी उपजाऊ बनाया था… हाँ साहेब,आज भी पूर्वजों के पसीने की गंध फैली हुई हैहर घर मेंआंगन मेंखेतों मेंखलिहानों मेंयहाँ की मिट्टी की सोंधी...

डॉ. नंदकिशोर नवल कविता की एक जीवंत पाठशाला

डॉ. नंदकिशोर नवल कविता की एक जीवंत पाठशाला

नवल जी के देहावसान की खबर स्वाभाविक रूप से दु:खद है, क्योंकि भौतिक रूप से उन्हें देखना अब संभव नहीं होगा। पिछले कुछ वर्षों से उनका स्वास्थ्य लगातार ख़राब चल रहा था और खबरों के अनुसार इस लॉकडाउन में वह घर में ही फिसल कर गिर भी पड़े थे, इसलिए कुछ अनहोनी की आशंका तो बनी हुई थी। 12 मई...

संस्मरण: नंदकिशोर नवल में भाषा का पाखंड या विद्वता के प्रदर्शन की कभी मंशा नहीं दिखी

संस्मरण: नंदकिशोर नवल में भाषा का पाखंड या विद्वता के प्रदर्शन की कभी मंशा नहीं दिखी

कल रात जब मेरे गुरु और हिंदी के वरिष्ठ आलोचक नंदकिशोर नवल के निधन की खबर आई तो मुझे अपने छात्र जीवन के उन दिनों की याद आई जब हम मानते थे कि नवल जी तो कभी बूढ़े भी नहीं हो सकते। उनका व्यक्तित्व ही ऐसा था। उन दिनों वह किसी हीरो की तरह दिखते थे। वैसे भी वे विद्यार्थियों...

मजदूरों और कोरोना पर गुलज़ार की नज़्में- मिलेंगे तो वहां जाकर, जहां जिंदगी है

मजदूरों और कोरोना पर गुलज़ार की नज़्में- मिलेंगे तो वहां जाकर, जहां जिंदगी है

जाने-माने गीतकार, लेखक और फिल्म निर्देशक गुलज़ार सामाजिक मुद्दों पर हमेशा बेबाकी से अपनी राय रखते हैं। वे अक्सर नज़्मों, गीतों और कविताओं के जरिए अपने जज्बात को बयां करते हैं। मौजूदा कोरोना संकट और लॉकडाउन की वजह से मजदूरों के पलायन पर भी उन्होंने अपनी संवेदनाएं व्यक्त की हैं। उन्होंने अपनी दो मार्मिक नज़्मों के जरिए मजदूरों की दुर्दशा...

हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद के ख़िलाफ़ थे रामधारी सिंह दिनकर

हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद के ख़िलाफ़ थे रामधारी सिंह दिनकर

रामधारी सिंह दिनकर के सम्बन्ध में लगभग एक स्थापना-सी बन चुकी है कि वे थोड़े-थोड़े सबको अच्छे लगते हैं। उनमें राष्ट्रवाद के भी तत्व हैं, गांधीवाद और मार्क्सवाद के भी तत्व हैं। दिनकर के प्रायः आलोचक उन्हें थोड़ा गांधीवादी भी मानते हैं और थोड़ा मार्क्सवादी भी, थोड़ा राष्ट्रवादी भी और थोड़ा हिंदूवादी भी। संभवतः उनके मूल्यांकन की इसी प्रवृत्ति के...

सरोज कुमारी की तीन कविताएं

सरोज कुमारी की तीन कविताएं

सरोज कुमारी: एम.ए, एम.फिल, पी-एचडी (दिल्ली विश्वविद्यालय) विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित। ‘निराला का गद्य साहित्य’, ‘राम की शक्तिपूजा का रचना-विधान’, ‘छायावादी कविता और राम की शक्तिपूजा’ और ‘स्त्री लेखन का दूसरा परिदृश्य’ पुस्तकें प्रकाशित। दिल्ली विश्वविद्यालय के विवेकानंद महाविद्यालय में सहायक प्राध्यापक। दहलीज दहलीज के भीतरएक अदृश्य लक्ष्मण रेखा से बंधे मेरे पांवसदियों से पी रहे हैं तालाबंदी का...

रामधारी सिंह दिनकर के राष्ट्रवाद को निगलना चाहता है हिंदुत्व राष्ट्रवाद

रामधारी सिंह दिनकर के राष्ट्रवाद को निगलना चाहता है हिंदुत्व राष्ट्रवाद

रामधारी सिंह दिनकर की ‛राष्ट्रवाद’ संबंधी समझ को दृढ़ता के साथ रेखांकित करने की जरूरत है क्योंकि हिंदुत्ववादी शक्तियां उनकी राष्ट्रीय भावों की ओजपूर्ण कविताओं के सहारे अपने अंधराष्ट्रवाद के अभियान को साधना चाहती हैं। यह अकारण नहीं है कि हिमालय के शिखरों पर चढ़कर उनकी कविताओं के ‛आलाप’ किए जा रहे हैं। ऐसा संभवतः इसलिए किया जा रहा है...

साहित्य में नायक की पारंपरिक अवधारणा बदल दी प्रेमचंद ने

साहित्य में नायक की पारंपरिक अवधारणा बदल दी प्रेमचंद ने

मुझे पिछले वर्ष भी हाजीपुर के इस गांधी आश्रम में आने का मौका मिला था। हाजीपुर की सबसे अच्छी बात ये है कि यहां हमेशा प्रेमंचद जयंती दो तीन दिनों के बाद मनाई जाती है। वैसे भी 31 जुलाई को हर जगह प्रेमचंद जयंती कार्यक्रमों की धूम मची रहती है। पूरे बिहार में छोटी-छोटी जगहों, कस्बों व विश्वविद्यालयों में इतनी...

आलोचना का लोकधर्म: आलोचना की लोकदृष्टि

आलोचना का लोकधर्म: आलोचना की लोकदृष्टि

बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी शाकिर अली कवि, आलोचक, एक्टिविस्ट कई रूपों में दिखाई देते हैं। लेकिन इन सब में मुझे उनका विद्यार्थी रूप सर्वाधिक महत्वपूर्ण लगता है। ज्ञान की भूख और किताबों से उनका प्रेम, उनको निकट से जानने वाले ही जान सकते हैं।

राही मासूम रज़ा की चिंता के केंद्र में है हिंदुस्तान की साझी संस्कृति

राही मासूम रज़ा की चिंता के केंद्र में है हिंदुस्तान की साझी संस्कृति

राही मासूम रज़ा के सबसे बड़े आलोचक प्रो0 कुँवर पाल सिंह से मिलने अलीगढ़ जाना चाहता था। उनसे मिलना सिर्फ इसलिए नहीं चाहता था कि वे राही मासूम रज़ा के सबसे बड़े आलोचक हैं बल्कि इसलिए भी कि वे उनके सबसे अच्छे दोस्त रहे हैं। राही मासूम रज़ा ने 1966 ई0 में सबसे पहला और सबसे चर्चित हिंदी उपन्यास ‘आधा...

प्रेमचंद की कहानी: हज-ए-अक्बर

प्रेमचंद की कहानी: हज-ए-अक्बर

(1) मुंशी साबिर हुसैन की आमदनी कम थी और ख़र्च ज़्यादा। अपने बच्चे के लिए दाया रखना गवारा नहीं कर सकते थे। लेकिन एक तो बच्चे की सेहत की फ़िक्र और दूसरे अपने बराबर वालों से हेटे बन कर रहने की ज़िल्लत इस ख़र्च को बर्दाश्त करने पर मजबूर करती थी। बच्चा दाया को बहुत चाहता था। हर दम उसके...

अदनान बिस्मिल्लाह की कहानी: और रज़िया भाग गई

अदनान बिस्मिल्लाह की कहानी: और रज़िया भाग गई

अदनान बिस्मिल्लाह: 12 मई 1977 को बनारस में जन्म। एम.फिल, पी.एच.डी. जामिया मिल्लिया इस्लामिया और पी.जी.डी. मास मीडिया जामिया मिल्लिया इस्लामिया से। 6 वर्षों तक दूरदर्शन में कार्य। विगत 15 वर्षों से रंगकर्मी के रूप में सक्रीय। ‘खानम’ धारावाहिक दूरदर्शन, उर्दू में नायक एवं सह-निर्देशक। पटकथा लेखन, विभिन्न कहानियों का नाट्य रूपान्तरण तथा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कहानी और कविताएं प्रकाशित।...

हिंदी और उर्दू में फ़र्क़ है इतना, वो ख़्वाब देखते हैं हम देखते हैं सपना

हिंदी और उर्दू में फ़र्क़ है इतना, वो ख़्वाब देखते हैं हम देखते हैं सपना

(संवाद-स्थलः लोदी बागान के एक भुरभुरे मक़बरे की सीढ़ियां, मौसम बहार का। एक सुहानी शाम )। उर्दू: संवाद शुरू करने से पहले क्यों न इसकी कुछ सीमाएं या शर्ते तय कर लें। हिंदी: ज़रूर, वर्ना बात बिखर जायेगी या एक भद्दी, भारी और बासी बहस में बदल जायेगी। उर्दू: तो पहली शर्त तो यही कि हम इस संवाद के दौरान...