Author: Ajay Chandravanshi (अजय चन्द्रवंशी)

Home Ajay Chandravanshi
अत्याचार की गहरी पीड़ा और प्रतिशोध की चेतना का फिल्मांकन है ‘सूत्रधार’
Post

अत्याचार की गहरी पीड़ा और प्रतिशोध की चेतना का फिल्मांकन है ‘सूत्रधार’

सामंतवाद ने ग्रामीण लोकजीवन को अभी हाल तक इस कदर जकड़ा था कि छोटे-छोटे ज़मीदार ही वहां के ‘भाग्य-विधाता’ हुआ करते थे। उनके क्षेत्र की तमाम गतिविधियां जैसे उनकी मर्जी से चलती थीं। आम जन का कदम-कदम पर अपमान सामान्य बात थी। उस पर भी वे ‘प्रजा हितैषी’ होने का दम भरते थे। दूसरी तरफ...

अस्मिता और पारिवारिकता के बीच का सामंजस्य है जब्बार पटेल की फिल्म ‘सुबह’
Post

अस्मिता और पारिवारिकता के बीच का सामंजस्य है जब्बार पटेल की फिल्म ‘सुबह’

समाज में स्त्री द्वारा अपनी अस्मिता की तलाश का संघर्ष जटिल रहा है। एक तो जैविक रूप से मातृत्व की जिम्मेदारी का निर्वहन और दूसरा पितृसत्ता के मूल्य जनित बाधाएं; इनके कारण उसका रास्ता कठिन हो जाता है। संघर्ष पुरूष वर्ग में भी रहा है, खासकर आर्थिक। क्योंकि आर्थिक अक्षमता अधिकांश समस्याओं की जड़ है।...

हिंदी परंपरा के आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा को आप कितना जानते हैं?
Post

हिंदी परंपरा के आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा को आप कितना जानते हैं?

डॉ. रामविलास शर्मा के महत्व का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि उनके आलोचनात्मक लेखन के प्रारंभिक दौर (चालीस के दशक) से लेकर आज उनके निधन के बीस वर्ष बाद तक वे बहस के केंद्र में हैं। इधर, नामवर जी के निधन पर और रेणु के जन्म शताब्दी पर भी उनके...

फिल्म ‘तीसरी कसम’ : न कोई इस पार हमारा, न कोई उस पार
Post

फिल्म ‘तीसरी कसम’ : न कोई इस पार हमारा, न कोई उस पार

रेणु की चर्चित कहानी ‘तीसरी कसम उर्फ़ मारे गए गुलफ़ाम’ पर आधारित फिल्म ‘तीसरी कसम'(1966) की काफ़ी चर्चा होती रही है। फिल्म के निर्माता गीतकार शैलेन्द्र थे।उन्होंने बहुत उत्साह और जोख़िम से फिल्म का निर्माण कराया था, मगर अपेक्षित सफलता नहीं मिलने पर काफ़ी आहत भी हुए थे, जिसकी एक अलग कहानी है। कहानी और...

छुआछूत और जातिवाद पर आधारित बिमल रॉय की फिल्म ‘सुजाता’ क्यों देखनी चाहिए
Post

छुआछूत और जातिवाद पर आधारित बिमल रॉय की फिल्म ‘सुजाता’ क्यों देखनी चाहिए

अश्पृश्यता मानव समाज के लिए कलंक रही है। किसी व्यक्ति को जन्म के आधार पर हीन अथवा कमतर समझना जितना अमानवीय है, ऐसी व्यवस्था के औचित्य के लिए तर्क गढ़ना उतना ही कुत्सित। सामंती समाजों के दौर में इसका चेहरा अत्यंत घिनौना था; औद्योगिक पूंजीवादी दौर में इसमें उल्लेखनीय कमी अवश्य आई, मगर इसमें संविधान...

कस्बाई मध्यवर्गीय जीवन का अंतर्द्वंद्व है रितुपर्णो घोष की फिल्म ‘रेनकोट’
Post

कस्बाई मध्यवर्गीय जीवन का अंतर्द्वंद्व है रितुपर्णो घोष की फिल्म ‘रेनकोट’

कस्बाई क्षेत्र का मध्यवर्गीय जीवन अजीब द्वंद्व से घिरा होता है। इच्छाएं बड़ी मगर सुविधाओं के नहीं होने से उलझने बढ़ती जाती हैं। युवावस्था की रोमानियत यथार्थ के धरातल से टकराने पर सहसा उसे स्वीकार नहीं कर पाती। मगर यथार्थ को इंकार करने से वह बदल नहीं जाता। इसलिए विडंबनाएं होती हैं, दिल टूटते हैं...

फिल्म ‘काबुलीवाला’ बताती है- देशप्रेम सार्वभौमिक होता, चाहे हिन्दोस्तान हो या अफगानिस्तान
Post

फिल्म ‘काबुलीवाला’ बताती है- देशप्रेम सार्वभौमिक होता, चाहे हिन्दोस्तान हो या अफगानिस्तान

प्रेम और सम्वेदना मनुष्य की सहजवृत्ति हैं। हमारा संवेदनात्मक लगाव केवल ‘अपनों’ से नहीं अपितु ‘दूसरों’ से भी हो सकता है। या यों कहें कि जिनसे हमारा लगाव हो जाता है उसे हम अपना समझने लगते हैं। इस लगाव के कई रूप और नाम हैं। स्त्री पुरुष का प्रेमाकर्षण है, मित्रता है, बड़ों के प्रति...

त्रिलोक जेटली की फिल्म ‘गोदान’ : कृषक जीवन की विडम्बना
Post

त्रिलोक जेटली की फिल्म ‘गोदान’ : कृषक जीवन की विडम्बना

प्रेमचंद का कालजयी उपन्यास ‘गोदान’ सर्वाधिक पढ़े जाने वाले उपन्यासों में है। इस उपन्यास में तत्कालीन कृषक जीवन की विडम्बना को जिस शिद्दत से दिखाया गया वह अभूतपूर्व था। ‘होरी’ भारतीय कृषक जीवन का प्रतिनिधि पात्र बन गया। उसका चरित्र देशकाल बद्ध होते हुए भी अपनी सम्वेदना में उसका अतिक्रमण कर गया है। यूं किसानी...

फिल्म ‘बंदिनी’ : मेरे साजन हैं उस पार, मैं मन मार, हूँ इस पार
Post

फिल्म ‘बंदिनी’ : मेरे साजन हैं उस पार, मैं मन मार, हूँ इस पार

मानवता और प्रेम मनुष्य मात्र की सहजवृत्ति है, मगर मातृत्व की अतिरिक्त क्षमता के कारण और उससे जनित जैविक-मनोवैज्ञानिक कारणों से भी स्त्रियों में ममत्व और करुणाशीलता के अधिक उदाहरण देखे जाते हैं। निष्ठुर, स्त्री या पुरूष कोई भी हो सकता है मगर फिर भी स्त्रियों में इसके उदाहरण अपेक्षाकृत कम मिलते हैं। “स्त्री पैदा...

सत्यजीत राय की फिल्म ‘सद्गति’ यानी मृत्यु की सही गति अर्थात ‘मोक्ष’ की प्राप्ति
Post

सत्यजीत राय की फिल्म ‘सद्गति’ यानी मृत्यु की सही गति अर्थात ‘मोक्ष’ की प्राप्ति

प्रेमचंद तत्कालीन समाज के कुशल चितेरे हैं। वे समाज के अंतर्विरोधों, विडम्बनाओं से आँख नहीं चुराते बल्कि जोखिम की हद तक ‘नंगी सच्चाई’ को उजागर करते हैं। वे चाहते तो कइयों की तरह निजी सुख-दु:ख और व्यक्तित्व के मनोवैज्ञानिक चित्रण तक सीमित रह सकते थे, लेकिन उन्होंने दूसरा रास्ता चुना। उनकी बहुत-सी कहानियां अपने समय...