Author: Ajay Chandravanshi (अजय चन्द्रवंशी)

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धरती के लाल : ख़्वाजा अहमद अब्बास की समानता और शोषण से मुक्ति का स्वप्न
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धरती के लाल : ख़्वाजा अहमद अब्बास की समानता और शोषण से मुक्ति का स्वप्न

1943 का बंगाल का अकाल भीषण त्रासदी थी। लगभग तीस लाख लोग भूख से काल कलवित हो गए थे। माना जाता है कि यह त्रासदी प्राकृतिक कम मानव निर्मित अधिक थी। चावल के उत्पादन में उल्लेखनीय कमी नहीं होने के बावजूद द्वितीय विश्वयुद्ध की परिस्थितियों के चलते ब्रिटिश सरकार की अदूरदर्शिता के कारण, बर्मा पर...

सबकुछ बिकने और बेचे जाने के दौर में फिल्म ‘मंथन’ देखनी चाहिए
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सबकुछ बिकने और बेचे जाने के दौर में फिल्म ‘मंथन’ देखनी चाहिए

सहकारिता समाजवाद का गोमुख है। एक समतावादी समाज का निर्माण उसके सदस्यों के पारस्परिक सहयोग और भाईचारा से ही सम्भव है। प्राकृतिक संसाधनों और उससे निर्मित उत्पादों का नियंत्रण एवं नियमन समाज के सदस्यों द्वारा किए जाने पर ही प्रत्येक व्यक्ति को उसके योगदान के अनुरूप प्रतिफल प्राप्त हो सकता है। सभ्यता के प्रारंभिक मंज़िल...

महबूब खान की फिल्म ‘मदर इंडिया’ हर किसी को क्यों देखनी चाहिए!
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महबूब खान की फिल्म ‘मदर इंडिया’ हर किसी को क्यों देखनी चाहिए!

भारत में स्त्रियों की स्थिति पितृसत्ता के अधीन विरोधाभासी और द्वंद्वात्मक रही है। समय के साथ इसमें परिवर्तन होता रहा और पूर्व कालों की दृष्टि से आज उसकी स्थिति अधिक लोकतांत्रिक कही जा सकती है। उनकी यह स्थिति समाज सापेक्ष और वर्ग सापेक्ष भी रही है। कृषक और श्रमिक वर्ग में स्त्रियां अपेक्षाकृत अधिक अधिकार...

पुस्तक समीक्षा  ▏  एक गोंड गांव में जीवन: वेरियर एल्विन
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पुस्तक समीक्षा ▏ एक गोंड गांव में जीवन: वेरियर एल्विन

भारतीय जनजातियों पर शोध करने वाले मानवशास्त्रियों में वेरियर एल्विन (1902-64) का विशिष्ट स्थान है। वे काफी लोकप्रिय हुए और कई मामलों में विवादास्पद भी रहें। मुरिया जनजाति पर उनका शोध ‘मुरिया एंड देयर घोटुल’ विश्व स्तर पर चर्चित हुआ। उनकी पद्धति से कुछ लोगों को असहमति भी रही है, खासकर ‘काम’ सम्बन्धों के नियमन...

प्यासा: ये महलों, ये तख्तों, ये ताजों की दुनिया…ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है
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प्यासा: ये महलों, ये तख्तों, ये ताजों की दुनिया…ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है

कवि (शाइर) होने की पहली शर्त संवेदनशीलता है। जो व्यक्ति संवेदनशील न हो, जिसे अपने आस-पास की दुनिया की विडम्बनाएं झकझोरती न हों, जो दूसरों के दुःख को देखकर बेचैन न हो जाता हो, वह और चाहे जो कुछ भी हो कवि नहीं हो सकता। कलाकार की यही संवेदनशीलता कुछ हद तक उसे ‘असमान्य’ बना...

आलोचना का लोकधर्म: आलोचना की लोकदृष्टि
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आलोचना का लोकधर्म: आलोचना की लोकदृष्टि

बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी शाकिर अली कवि, आलोचक, एक्टिविस्ट कई रूपों में दिखाई देते हैं। लेकिन इन सब में मुझे उनका विद्यार्थी रूप सर्वाधिक महत्वपूर्ण लगता है। ज्ञान की भूख और किताबों से उनका प्रेम, उनको निकट से जानने वाले ही जान सकते हैं।