अदनान बिस्मिल्लाह की कहानी: और रज़िया भाग गई

अदनान बिस्मिल्लाह की कहानी: और रज़िया भाग गई

अदनान बिस्मिल्लाह: 12 मई 1977 को बनारस में जन्म। एम.फिल, पी.एच.डी. जामिया मिल्लिया इस्लामिया और पी.जी.डी. मास मीडिया जामिया मिल्लिया इस्लामिया से। 6 वर्षों तक दूरदर्शन में कार्य। विगत 15 वर्षों से रंगकर्मी के रूप में सक्रीय। ‘खानम’ धारावाहिक दूरदर्शन, उर्दू में नायक एवं सह-निर्देशक। पटकथा लेखन, विभिन्न कहानियों का नाट्य रूपान्तरण तथा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कहानी और कविताएं प्रकाशित।

दिन शाम की दहलीज पर पहुंच चुका था। पंछी वापस घरों की ओर मुड़ चुके थे। सूरज छुपने का प्रयास कर रहा था मानो अपनी ही रोशनी से भागना चाह रहा हो। पंछियों का कलरव शोर बनकर कानों में गर्म तेल उड़ेल रहा था। कमरे के सारे दरवाजे खिड़कियां बेजान सिसकियों से सिहरने लगे थे और अंदर अमावस्या का सियापा पसरा हुआ था। अलमारी पीसा की मीनार की तरह, चारपाई तीन पायों और ईटों के सहारे, सिंगारदान पर आधा टूटा शीशा, कैंची पर सूखे खूनी धब्बे, अलगनी पर लटके-लटके फटे मटमैले कपड़े और रजिया।

जी हां, रज़िया भी चिर परिचित स्थान। पर यथावत विद्यमान थी। अगर कोई चीज़ करीने से नहीं थी तो उसके हाथ, पांव, कपड़े, चेहरे को छुपाए उसके बाल, सर से रिसता खून, फर्श पर बिखरी चूड़ियां, दिल की धड़कनें, सांस, मन का चिड़चिड़ापन और उखड़ती सिसकियाँ। वह अपनी अटकती हिचकियों को उस तरह रोकती जैसे उसकी आवाज़ से कोई बच्चा, जो रोते-रोते अभी सोया है कहीं जाग न जाए।

रज़िया तीन भाइयों में एक बहन जिनमें से दो उससे छोटे पर अकड़ में बड़े। कहने को तो रज़िया गयासुद्दीन की बेटी थी पर कोई मेहमान घर पहुंचे तो उसे कामवाली बाई समझता। उजला रंग धब्बेदार काला पड़ चुका था जैसे सफेद कपड़ों पर बरसाती पानी से बना कीचड़ छिटक-छिटक कर चिपक गया हो। उम्र बीस के करीब पर तीस से कम नहीं लगती। पतली-दुबली छरहरा बदन या यूँ कहें कि छोहारे को खींचकर लंबा कर दिया गया हो।

रज़िया अपनी नानी के घर पर ही रही, वहीं पढ़ी, बढ़ी। रह-रहकर उसे अपनी नानी की याद आती। वहां कितने आराम से रहती, खेलती-कूदती। गांव में उसकी कई सहेलियां थी। चंपा, गुलनाज़, रोशनी और अनीता। उनके साथ हाट बाजार जाना लुका-छुपी, एक्कड़-दुक्कड़, खेत की मेड़ों पर दौड़ प्रतियोगिता। उसकी अपनी दुनिया थी। उस दुनिया में खुशियां थी, बचपन था, छोटे-मोटे झगड़े थे, चाट की दुकान थी, स्कूल, नीम का पेड़, घर का आंगन, नानी की गोद, मामा का दुलार और अपनी मृत्यु शैया पर अनीता से बिछड़ने तक के सपने।

आजकल जब भी वह मेरे घर आती गुमसुम और बेखबर-सी बैठी रहती। मैंने कई बार अनीता से पूछा पर उत्तर- “भैया कोई बात नहीं है बस तबीयत ठीक नहीं है।” अनीता के रेडियो स्टेशन से यही समाचार प्रसारित होता रहता। पर मेरे लिए यह असहज था। मैंने शरारती चुलबुली रज़िया को देखा था। गाँव में जब भी घर आती कभी पीछे से आकर आँखें मूंद देती, कभी मैं सोता रहता तो मेरी नाक में तिनका डाल देती और होली पर तू मेरे पीछे पड़ जाती। जब तक वह मुझे रंगों से सराबोर नहीं करती थी। चैन की सांस नहीं लेती और जमीन पर लोट-लोटकर हँसती। पूरे घर में किसी की हिम्मत नहीं थी कि मुझे रंग लगाने की। सब जानते थे कि मुझे रंगों से सख्त नफरत है। रजिया थी कि बिना किसी भय के मुझे लीप-पोत देती थी। उसे देखता रहता, निश्चल मन की उसकी हंसी, उसकी खुशी। सच कहूँ तो उसके रंग लगाने से मुझे गुस्सा नहीं आता, वही क्षण होता था जब मुझे रंगों से नफरत नहीं नहीं होती थी। आज भी मुझे उसका रंगीन दमकता चेहरा नज़र आता है। वह खिलखिलाती हंसी जैसे सूरजमुखी फूल पूरे उरूज पर हो और खेत में गेहूं की बालियां झूम रही हों।

रज़िया बेतहाशा रोई थी। घर से लेकर बस अड्डे तक। वह रोए जा रही थी। बार-बार बेहोश होती और होश में आते ही फिर रोने लगती। बस अड्डे पर भीड़ लग गई, “सरपंच जी की नतनी काहे को रो रही है?” जैसे जमीन पर गिरी जलेबी पर मक्खियां भिनभिना रही हो। उसे चुप कराने का अथक प्रयास जारी था। रज़िया के मामू ने उसे चुप कराने के लिए गले से लगाया पर रज़िया उनसे छूटकर अनिता से जा चिपकी और फूट-फूटकर रोने लगी। उसकी सांसें उखड़ने लगी थी पर मजबूरी थी बस जाने वाली थी और अनीता उसमें बैठ चुकी थी। अनीता का पूरा परिवार शहर में शिफ्ट हो गया था उधर रज़िया का हाल मानो ऐसा था जैसे सुहागन की मांग से जबरदस्ती उसका सिंदूर पोछा जा रहा हो। और अनीता चली गई। रजिया गांव में अकेली रह गई।

बारहवीं का परीक्षा फल घोषित हो चुका था। रज़िया प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण। आगे की पढ़ाई के लिए समस्याएं विचाराधीन थी कि अचानक रज़िया का छोटा भाई और अम्मी उसे शहर ले जा आने आ गए। रज़िया की खुशी का ठिकाना नहीं रहा, वो शहर जाएगी, अनीता तो वहीं है, आगे की पढ़ाई मिलकर करेंगे। रज़िया ऐसे उछालने लगी जैसे बिना पानी की मछली को चंद बूंदे मिल मिल गई हों जीवित रहने के लिए। ननिहाल ने कलेजे पर पत्थर रख रज़िया को विदा किया। आखिर बेटी अपने मां-बाप की थी। दोपहर की गाड़ी से रज़ियाया शहर को रवाना हो गई। वह बार-बार सोचती- “बस जल्दी क्यों नहीं पहुंचती?” मन बेचैन था। रह-रहकर बाहर भागती सड़कों, दौड़ते मकानों को देखती। सड़क के दोनों ओर खेतों में गेहूं के पौधे उसे आज खुशी नहीं दे रहे थे, लग रहा था कि ये आग की लपटें हैं जो इसे जला देगी पूरी बस जल जाएगी। उसने आँखें मूंद ली।

रज़िया जब घर रह पहुँची तो उसके सामने से पर्दा हटा। जिन मां-बाप को रज़िया की इतने साल फिक्र ना थी यकायक उसकी सुध लेने कैसे पहुंच गए? रज़िया का दिमाग इस बात पर अब जाकर ठिठका। दरअसल, रज़िया की मां ने नई नौकरी पकड़ ली थी। उनके पास अब घर के लिए समय नहीं था। अब बेटे तो राजकुमार थे। उन्हें उफ्! तक आए तो मां-बाप के प्राण सूख जाते। लड़कों से घर का चिराग रोशन करता है। लड़के तो माथे पर भव्यता की निशानी होते हैं। बेटे तो गज भर की छाती होते है। रज़िया से पहले एक लड़का पेट में खत्म हो गया था उसके बाद यह मनहूस पैदा हुई थी। पहले पता होता तो गिरा देती। चलो अब बेटी है तो काम धाम में हाथ बंटाएगी। और रज़िया अपने घर में काम करने लगी। झाड़ू-पोंछा, सर सफाई , खाना पकाना। कॉलेज जाने की इच्छाएँ रोज उसे फर्श पर मैली मिलती और वह उसे रगड़-रगड़ कर पोंछती।

“रज़िया, मुझे पानी दो” -बारह साल के अकील ने कहा। “बदतमीजी की हद हो रही है अकील”-रज़िया ने धमकाया।
“कामचोर कहीं की, यहां पड़े-पड़े खा-खाकर सांड़िन हो रही है कुत्तिया हरामजादी।”
“तड़ाक” -रज़िया ने एक जोर का तमाचा रसीद किया।
वह रोते-धोते अंदर भागा, फिर क्या था दूध में उफान आ ही गया जिससे मौका मिला, जो भी आया कथरी पर रुई धुनता चला गया। रज़िया बिलख पड़ी। यह तो रोज का खेल है। जिस किसी ने भी रजिया की तरफदारी की उसका उस घर से आना जाना बंद।
ईद की तैयारियां पूरी हो चुकी थीं। सबके लिए सामान आ चुका था। अलविदा के लिए अलग, मेहमानों से मिलने के लिए अलग और रिश्तेदारों में जाने के लिए अलग। पड़ोस की नरगिस बुआ को एक-एक चीज दिखाई गई।
“रजिया के लिए यह सूट कैसा है?” -अम्मी ने नरगिस बुआ को अलमारी से एक सूट निकालकर दिखाया।
“भाभी, मुझे तो ये पुराना-सा लगे है।” -नरगिस बुआ ने उत्तर में प्रश्न दागा। “अरे! नहीं तो, वैसे भी उसे कौन-सा बाहर जाना है। घर में ही तो माँझना-धोना है। फिर भी भाभी….” -नरगिस बुआ से कुछ भी कहते न बना। जब माँ ही न चाहे तो जमाना कहां तक बेटी की खुशियों के लिए लड़ें।

रज़िया ने बावर्चीखाने की खिड़की से देखा। पिछले साल अम्मी ने जो अलविदा पर पहना था यह वही सूट था। वह अपनी कोठरी में आ गई और कथरी में मुँह डालकर रोने लगी। सुबह-सुबह रजिया ने अपनी गठरी खोली और नानी के घर से लाए कपड़ों के पल्लों को निकाला कुछ जो अभी भी नए से लग रहे थे उनमें से दो कमीज के पल्लों को जोड़ एक ढांचा खड़ा किया, फुल बाजू को काट हाफ किया और अनीता ने जन्मदिन पर जिस गोटे से बांधकर उसे गिफ्ट दिया था उसी से गला सजाया। अनीता की याद हूक-सी उठने लगी। रज़िया दीवार से चिपक गई और सिसकियों में अनीता देर तक गूंजती रही।

रजिया का रमजान जैसे-तैसे बीता आज ईद है। सुबह से ही रज़िया बावर्ची खाने में है। घर को सजाया धजाया। अभी अम्मी उठेगी, फिर हाथ पैरों से उनके मेहंदी भी छुड़ानी होगी, सबके लिए चाय बनाना होगा, फिर नाश्ता। आज अनीता आएगी। रजिया अपनी सोच में गुम थी। सभी लोग नमाज के लिए गए। घर से लेकर सड़क, चौराहों, पूरे शहर में चहल-पहल और घर पर आने वालों का तांता लग गया। घर जो भी आया सबकी नजर रज़िया को ढूंढती रही। अनीता और नीरज जब आए तब पता चला रजिया कहां है। रजिया की मां ने बैठक में नीरज को बैठाया और ढेर सारी बुराइयों का चीथड़ा उसके सामने खोल दिया। अनीता पीछे वाली कोठरी में पहुंची। दरवाजा खोला। कमरे में अंधेरा था। बत्ती जलाई पर बल्ब नहीं था। माचिस खोज डिबरी से रोशनी की। रजिया कोने में सिंगारदान के पास सिकुड़ी सो रही थी। शाम ढल चली थी, अंधेरा वापस कमरे में आने लगा था। अनीता ने उसकी पीठ पर हाथ रखा। रज़िया के मुंह से तड़प के साथ आह निकली!

अनीता ने हाथ हटा लिया। बदन भट्टी की तरह तप रहा था। वह बड़ी मुश्किल से उठकर बैठी अनीता ने अंधेरे में गौर से देखा। चेहरे पर कई जगह नील पड़े थे। होंट फटे थे और आंखों के नीचे सूजन। दरअसल, जब रज़िया ने अपनी अम्मी के कपड़े न पहन कर खुद के बनाए कपड़े पहने तो जैसे घर की इज्जत सेवईं की चाशनी में डुबो दी और कोहराम मच गया।

हाँ, हाँ तू तो चाहती है हम बदनाम हो जाए जमाने वाले कहे कि बेटी को नौकरानी बनाकर रखा है। हम तो तुझ पर ढांते हैं। तू हमें बदनाम करना चाहती है। हमारी इज़्ज़त को मिट्टी में मिलाना चाहती है और कई झापड़ उसके मुंह पर रसीद कर दिए गए। रमज़ान के बाद ईद की नमाज खत्म होते ही शरीर में ताकत ज़ोर मारने लगी। और गयासुद्दीन समेत अकील, रहबर और निसार सबने अपनी थकान और कमजोरी दूर की, ऊपर से इल्ज़ाम अलग।

अरे! यह तो यहाँ रहना ही नहीं चाहती। वहाँ गाँव भागना चाहती है। हाँ वहाँ अपना कोई यार पाल रखा होगा। यार शब्द सुनते ही हड्डी-हड्डी गयासुद्दीन लोहा बन गया। यार है तेरा कोई, हआं…यार है तेरा कोई! ले दनादन लात, ले दनादन लात। बोल साली यार है तेरा कोई, यार है तेरा कोई, बोलती क्यों नहीं मादर….। और जब तक रज़िया के बदन से हरकत होती रही, तेल खौलता रहा।

अनीता को बर्दाश्त न हुआ, वह दनदनाती हुई आई- “चलो भैया!” और नीरज के साथ घर से बाहर निकल गई।

आज रजिया खुश थी। उसकी दुनिया में चमकी, सितारे से कुमकुम सजने लगे। पहली बार घर में किसी ने प्यार से सर पर हाथ रखा, उसके बारे में सोचा और अब्बू की मुख़ालिफत के बावजूद रहबर ने उसे मोहिनी सिलाई-बुनाई सेंटर में उसका दाखिला करा दिया। अनीता ने भी वहां दाखिला ले लिया। दोनों अपनी जिंदगी की ताजगी और भविष्य के सपने को कपड़े पर बेलबूटों की तरह काढ़ने लगी। रजिया एहसानमंद थी, अंदर ही अंदर वह रहबर को फरिश्ता समझने लगी थी। रोज़ दुआओं उसकी सलामती परवरदिगार-ए-आलम के खैरगार में रटती। रहबर उसके लिए नए कपड़े ले आया। साथ में धानी रंग की चूड़ियां भी। पर हिदायत दी अम्मी से न कहना। रज़िया मान गई, सोचा कहीं मेरी ही तरह गुस्से में रहबर के साथ भी वैसा न हो। ना बाबा ना। वह उसे तकलीफ नहीं देना चाहती थी।

अब रज़िया को दुःख-तकलीफ नहीं होती थी चाहे कोई कितना भी जुल्म करें। वह रहबर को देखती और मुस्कुरा देती, सोचती चलो कोई तो है जिसे उसके दर्द का एहसास है इस घर में।
“बाजी…बाजी…कहाँ हो तुम?”
रज़िया अपनी कोठी में सो रही थी। उसके कान में बाजी शब्द पहुंचा तो जैसे किसी ने उसके कानों में चाशनी घोल दी हो। कब से वह तरस रही थी सुनने को बाजी शब्द। सुबह की मार और बदन की टूटन सब भूलकर उसने आवाज़ दिया- “मैं यहाँ हूँ रहबर अपने कमरे में।”
“बाजी मेरा रिज़ल्ट आ गया।”
“चलो अब तुम बी.कॉम के दूसरे साल में आ गए।” रज़िया ने बड़ी मुश्किल से कराहते हुए कहा।
“हाँ…तुम्हें काफी दर्द हो रहा है क्या?”
“नहीं तो।”
“नहीं मैं सब जानता हूँ तुम छुपा रही हो।”
“अरे! नहीं रे तुझसे क्या छुपाना, बस सर फट रहा है।”
“अच्छा तुम सो जाओ मैं सर दबाता हूँ।”
“ठीक है…।”
“मैं भी यहीं सो जाता हूँ, तुमसे दूर जाने का मन ही नहीं कर रहा।”
“ठीक है सो जा, मैं भी थोड़ा आराम कर लूँ, फिर मुझे बर्तन भी साफ़ करना है। “
और रज़िया की आँख लग गई। राज़िया सो रही थी। रहबर की आँखें नाच रही थीं। उसकी आँखों में तेज़-तेज़ लट्टू घूम रहा था और रहबर का हाथ रज़िया के सर से सरक गया। रज़िया के बदन पर कीड़ा रेंगने लगा। रज़िया ने आँखें खोलीं, रहबर ऊपर लटक रहा था।
“रज़िया कुछ मत बोलो।” -रहबर ने उसका मुँह बंद करना चाहा।
“रहबर दूर हटो, पागल मत बनो।” -रजिया ने धक्का दिया। रहबर ने खींच लिया।
“तुम पागल हो गए हो, होश में आओ रहबर, भाई होश में आओ!”
“कुछ नहीं होगा रज़िया, बस कंप्रोमाइज ही तो करना होगा। फिर जिंदगी मौज की।”
“तुम्हारा दिमाग़ ख़राब हो गया है भाई। अल्लाह के लिए यहां से चले जाओ। मैं…मैं तुम्हारी बहन हूँ।” -रज़िया गिड़गिड़ाने लगी।
“रज़िया तुम पागल हो। भाई-बहन कुछ नहीं होता है। ये हमारे बनाए हुए रिश्ते है। मर्द और औरत का।”
“नहीं….नहीं….” -रज़िया दीवार से चिपक गई।”
“तुम शराफत से मान जाओ। मैंने यूं ही तुम्हें नहीं बचाया इन सब से।” रहबर ने गुस्से से कहा।
“अरे बाप तो बेटियों की इज्जत खराब करते ही आए अब भाई भी।” रज़िया हतप्रथ थी।
“और ज्यादा नाटक नहीं।” -रहबर ने धमकाया।
“चले जाओ यहां से।” -रजिया ने फिर याचना की।
“तुम्हारे साथ और भी बुरा हो सकता है।” रहबर ने फिर धमकाया।
“रजिया..रजिया…”
” नहीं…नहीं…”
” रज़िया…”
” नहीं भाई…”
” रज़िया….मान जा…” – रहबर किचकिचाया। रज़िया दीवार में कांपती रही।
” नहीं मानेगी…? -रहबर ने उसे जकड़ लिया।
“हट जाओ…” -रज़िया ने ज़ोर का धक्का दिया। रहबर दूर जा गिरा। वह कुत्ते की तरह उस पर झपटा।
रज़िया ने विरोध किया – “नहीं…” और रहबर का मुँह नोच लिया। गुस्से में रहबर ने सिंगारदान पर रखी कैंची रज़िया के सर पर दे मारी। रजिया के मुंह से एक चीख़ फूटी, खून का फव्वारा छिंटककर दीवार और सिंगारदान पर जा पड़ा। रहबर तेजी से बाहर निकल गया। रज़िया कोने में दीवार से लुढ़क दोहरी हो गई और धानी चूड़ियाँ फर्श पर बिखर गईं।

शाम का मंज़र घर में कुछ और ही रहा। अम्मी ने आते ही रज़िया को आवाज़ दिया। घर का सारा काम उसी तरह फैला हुआ था और अम्मी आगबबूला। रज़िया..रज़िया…। अम्मी ने कई बार आवाज़ लगाई मगर कोई जवाब न मिला। अरे! मर गई क्या? यहाँ तो दिनभर नौकरी करो और घर जाओ तो कोई एक गिलास पानी भी कोई नहीं पूछता।

रज़िया को जब होश आया तो अंधेरा घिर चुका था। खून जम चुका था। और घर में बहस की आँधी जोरों से चल रही थी। विषय रज़िया। इसे वापस गाँव छोड़ा आया जाए। यह कामचोर है। हमारी बदनामी करा रही है। इसे उकसाया जा रहा है हमारे खिलाफ। वगैरह-वगैरह। रज़िया अपनी कोठरी में पड़ी अपनी नियति को छत से छूटते पपड़ियों में तलाश रही थी।

रात के ग्यारह बज रहे थे। रहबर घर में दाखिल हुआ। उसके चेहरे पर चोट के निशान देखकर सब दंग। अम्मी-अब्बू की जान सूख गई। अम्मी ने तुरंत उठकर उसे बिठाया। क्या हो गया मेरा बच्चा? यह चोट कैसे लगी? रहबर ने दिन की घटना सबको बताई कि रजिया पागल हो गई है। पता नहीं क्यों मुझे मारने लगी, फिर कहने लगी तुम सब को फँसा दूँगी, सबको जेल भिजवा दूँगी और अपने सर पर कैंची घोप लिया उसने…. वो… तो मेरी तरफ भी दौड़ी पर मैं भाग गया।

निसार रज़िया को उसके कमरे से बालों से खींच आंगन में घसीट ले आया। और लात-घूँसों की बारिश करने लगा। “तू हम लोगों को फंसाएगी, हमें जेल भेजेगी।”
“नहीं भाईजान मेरी बात तो सुनो, मेरी बात तो सुनो भाई जान!” पर उसकी किसी ने न सुनी। रज़िया की किसी ने तड़प न देखी, न घुटन, न छटपटाहट और न ही उसका घिघयाना। उसकी साँस गले में अटकने लगी। होंठों से खून रिसने लगे। उसके सिर से बाल उखड़ कर कई लोगों के हाथ में आ गए और आंगन में मछली की तरह छटपाटाती रही रज़िया।
अनीता और नीरज सन्न बैठे थे। उनका खून सूख गया था। शायद यह दरिंदगी की हद पार हो चुकी थी। कोई सगा ऐसा भी हो सकता है? ये अपने हैं? अरे लोग तो जानवर भी पालते हैं तो उससे भी एकबारगी प्यार हो जाता है। नीरज की आंखों में खून उतर आया।
“चल रजिया, अब तो पुलिस में शिकायत करनी होगी।”
“नहीं, मैं नहीं जाऊंगी।”
“तू पागल मत बन”- अनीता ने कहा।
“नहीं अनीता।”
“भाईया आप इसे ले चलो।”- अनीता ने नीरज से कहा। नहीं अनीता तू नहीं समझती घर की इज़्ज़ज की बात है।
“घर की इज़्ज़ज? अरे कौन-सी इज़्ज़ज? क्या रह गया है अब? तू किसी इज़्ज़त की बात कर रही है? न मां, न बाप और भाई…भाई तो साले सब-के-सब” -और नीरज किचकिचा उठा।
“ऐसी इज्जत का क्या तू अचार डालेगी? और तेरी क्या इज़्ज़ज है घर में और क्या तू अपनी इज़्ज़ज बचा पाएगी उस घर में जहां लोग नहीं हैवान बसते हों। अनीता ने नीरज का साथ दिया।
“नहीं मैं कुछ नहीं चाहती, मैं कुछ नहीं चाहती। मुझे अकेला छोड़ दो यह मेरी ही किस्मत है। खुदा मालिक है…..।” और अनिता से चिपट फूट-फूटकर रोने लगी। नीरज घर से बाहर निकल गया। शाम होते-होते अनीता रज़िया को उसके घर छोड़ आई।

तीन दिन बीत गए इस बात को, रज़िया की कोई खबर नहीं। अनीता का दिल घबरा रहा था। अनीता परेशान थी। नीरज रज़िया की खबर लेने उसके घर पहुंचा। रज़िया के घर का नजारा भिन्न था। मोहल्ले की भीड़ दरवाजे पर खड़ी थी। भीड़ देख नीरज को कुछ समझ नहीं आया। उसका दिल बैठा जा रहा था, किसी अनहोनी की डर से। वह भागते कदमों से वहाँ पहुंचा। तरह-तरह की बातें हो रही थीं। वह भीड़ को भेदता आगे बढ़ा। पता चला- रजिया भाग गई।

जी हां, रजिया भाग गई। करती भी क्या? उस कलमुंही ने घर की नाक कटवा दी। वह जाकर अपनी हितैषी से अपना दुखड़ा जो रो आई थी। और क्या पता उस नीरज से ही इसका टांका भिड़ा हो? गत-दुर्गत, लानत-मलामत, इल्जाम, भड़ास, गाली, झापड़, लातों-घूँसों से चूर रज़िया आखिरकार भाग गई। पर जाते-जाते घर की इज़्जत नाली में मिला दी।

“अरे मैंने ऐसी बेटी ही क्यों जनी? पैदा होते उसका गला क्यों न घोट दिया। सारे जग में नाक कटवा दी कुलच्छिनी ने तो। कितना प्यार करते थे हम सब। एक ही तो बेटी थी। कितना प्यार दिया, नाज़ों से पाला। अरे कौन-सी कमी की थी हमने। कौन-सा गुनाह दिया रे मेरे खुदा….!” अम्मी पछाड़े मार-मार कर रो रहीं थी। कालेजा मुँह को आ रहा था। आँसू पलकों पर ही ठिठके हुए थे, नीचे उतरने की हिम्मत ही नहीं थी कि कहीं मेक-अप खराब न हो जाए।
रहबर का भी जोश कुनमनाया- “अरे एक ही तो बहन थी हमारी। कितने अरमाँ थे उसे लेकर। सब धरा का धरा रह गया। अरे उससे अच्छी तो मोहल्ले की लड़कियां हैं जो दिल से भईया कहती हैं और उससे भी ज्यादा मान सम्मान। उसने तो नाक ही कटवा दी हरामजादी ने।”

नीरज से यह सब बर्दाश्त न हुआ। वह वहाँ से चला आया कि कहीं वह गुस्से में कुछ कर न बैठे। मन में रज़िया की टीस और चुभन लेकर। रजिया की कब्र अभी ताज़ी थी। फातिहा पढ़ा जा रहा था। अनीता सन्न रह गई अपनी मृत्युशय्या पर।

समय बीत गया। इन वर्षों में अनीता की शादी हो गई। नीरज की पढ़ाई खत्म। नौकरी की तलाश में वह एक शहर से दूसरे शहर घूमता रहा। कानपुर, लखनऊ, दिल्ली, बेंगलुरु। बेंगलुरु के जी. सी. रोड पर खड़ा नीरज सोच रहा था कि नए शहर में कहाँ जाए तभी सड़क के दूसरी तरफ उसे रज़िया दिखी। वही दुबली-पतली, छरहरा बदन गोरी-चिट्टी, खिलखिलाती हंसी। वह जोर से चीखा रज़िया और सड़क के उस पार भागा। जब तक वह सड़क के पार तक पहुंचता एक झक सफेद कार रज़िया के सामने रुकी, कार का शीशा धीरे से नीचे उतरा। ड्राइवर सीट पर बैठा सफेद कपड़ों में काला-सा मोटा-सा भद्दे मुँह वाले आदमी ने दाँत निपोरे और रज़िया कार में दाखिल हो गई। नीरज सन्न रह गया। उसे लगा रज़िया ने उसे देखा नहीं। वह कितना खुश था। सोच रहा था कि रज़िया उससे आकर लिपट जाएगी और उससे कहेगी- “भईया मुझे घर ले चलो घर, अनीता के पास।” उसके कान कब से तरस रहे थे भईया शब्द सुनने को। कार कुछ दूर जाकर रुकी, रज़िया ने कार से नीरज की ओर देखा। उसकी आँखें डबडबाई हुई थीं, होंठ कांप रहे थे, वह चाह कर भी नीरज को पुकार नहीं पा रही थी। उसकी आँखों से निकला आँसू ‘भईया’ शब्द के एक-एक अक्षर बन उसके गालों पर लुढ़क रहा था। रज़िया ने अपना दुपट्टा उतारा और कार की खिड़की से बाहर गिरा दिया। कार शहर में गुम हो गई। नीरज वहीं चौराहे पर खड़ा रहा।

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