बिनोद कुमार राज ‘विद्रोही’ की कविता: तेरी भोंसड़ी के

बिनोद कुमार राज ‘विद्रोही’ की कविता: तेरी भोंसड़ी के

जी साहेब, जोहार
सच कहता हूं
मेरे दादा ने बताया था कि
यहाँ बहुत घनघोर जंगल हुआ करता था
आज से दुगुना
चारों ओर पहाड़ियों से घिरा
तब हमारे पूर्वजों ने
जंगल के बीचों-बीच
झाड़-झंझाड़-पुटुस को साफ किया था
रहने लायक झोपड़ी बनाया था
जमीन को भी उपजाऊ बनाया था…

हाँ साहेब,
आज भी पूर्वजों के पसीने की गंध फैली हुई है
हर घर में
आंगन में
खेतों में
खलिहानों में
यहाँ की मिट्टी की सोंधी महक में…
बहुत मेहनत के बाद बसा है यह गांव
धीरे-धीरे बढ़कर पांच सौ घरों का बना है यह गाँव
और तुम कहते हो
कि पांच महीने में ही खाली कर दूं यह गाँव
कि, तुम यहां धरती से कोयला निकालोगे
बदले में तुम मुझे
मुआवजा का झुनझुना पकड़ाओगे
जिसे सालभर तक हम बजाएंगे
फिर आ जाएंगे सड़क पर
न खेत रहेगा
न बारी
न घर रहेगा
न आंगन
फिर हम जिएंगे कैसे

नहीं-नहीं साहेब
नहीं छोड़ेंगे हम
अपना गांव
नहीं छोड़ेंगे हम
अपना जंगल, झरना, पहाड़
नदी, नाला, पनघट
ढोर, डांगर, महुआ और पलाश…
कहाँ जाएँगे हम
अपने पूर्वजों की आत्माओं को छोड़कर
यहां हमारा बचपन गुजरा है साहेब
उधर देखो-
वहां हम लोग कितकित खेलते थे
छोटा कका की बारी में लट्टू घूमाते थे
मंझला कका के बगीचा में गिल्ली-डंडा खेलते थे
उस नीम के पेड़ में झूला झूलते थे उस पहाड़ की तराई में
बैल और भेंड़-बकरियाँ चराते हैं
उ जो पहाड़ दिख रहा है न
उसमें हमलोग सरसो, गोंदली, मडूवा उपजाते हैं
उसके नीचे खेत में धान, गेहूं, गन्ना उपजाते हैं
उस बरगद की डाली को पकड़ कर बच्चे झूलते हैं
उस अखरा में करमा का झूमर हर साल होता है
उ देखिए-
उस पहाड़ की चोटी पर, जहां झंडा है
वहीं तो हमारे गांव के कुलदेवता रहते हैं…

नहीं-नहीं साहेब
इतनी सारी यादों को छोड़कर हम कहां जाएंगे
हमारे बाद हमारे कुलदेवता को टपान कौन ढारेगा
हम जानते हैं साहेब
ठगो मत हमें
बगल के प्रखंड में एक कोलियरी खुला है
वहां तुमलोगों ने जबरन जमीने लीं
गांव खाली कराया, पुनर्वास का लालच देकर
लेकिन पुनर्वास हुआ नहीं
हारकर वे चले गए
आसाम, बंगाल, भूटान, गुजरात, दिल्ली, मुंबई…
मजदूरी करने…
अभी लौट रहे हैं वो नंगे पाँव, कोरोना से डरकर
भगाया जा रहा है उन्हें
वहां की सरकारों द्वारा
आ रहे हैं वो
हजारों किलोमीटर पैदल चलकर
नन्हे बच्चों को बेतरा में लेकर
पुलिस की लाठियों से बदन छलनी कराकर
मुटरा ददा की मेहरारू तो
सड़क किनारे ही बच्चा जन्मी है
वह भी कराहते हुए डुगूर-डुगूर आ रही है
नंगे पांव
तुम मॉर्निंग वाक भी जाते हो तो
नए-नए जूते बदलकर
महसूस करो, उनके दर्द को

बताओ साहेब,
अब कहां रहेंगे वो
खाएंगे क्या
उपजाएंगे कहां
पांवों के छाले में मलहम कहां बैठकर लगाएंगे
कौन उन्हें गुड़ का शरबत पिलाएगा
यहां तो कोई पहचानने वाला नहीं है उन्हें
सब बाहरी है
आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, गुजरात, बिहार, कर्नाटक आदि के…
उनके घर, आंगन, बारी में
बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएं बन गई है
अफसरों के क्वार्टर बन गए हैं
किस मिट्टी को चुमेंगे वे
किस मिट्टी को माथे से लगाएंगे वे…
तुम उसे काम भी नहीं दोगे
अपना सब काम बाहरी मजदूरों से करा रहे हो
तुम बाहरी इसलिए रखते हो
कि कोई मजदूर मर भी गया
तो किसी को पता भी नहीं चलेगा
तुम्हारा लाखों का मुआवजा बच जाएगा
घरवाले फोन करेंगे तो
तुम कह दोगे वह काम छोड़कर चला गया है…
वाह! चित भी तेरी, पट भी तेरी…
इन बाहरियों के बीच
खो गए हैं यहां के मूलनिवासी
कोई अस्तित्व नहीं रहा उनका
तुमलोगों ने तो
इनके सब बांस कटवा दिए
अब बताओ-
कहाँ टी.वी. लगाकर
मोदी जी का भाषण उन्हें सुनाओगे
बोलो…
हमलोग सब देखें हैं साहेब
उस समय जिसने जमीनें नहीं देनी चाही
तुमलोगों ने उन्हें
झूठे मुकदमे में फंसाकर जेल भेजवा दिया
पुलिस से पिटवाया
गुंडों से पिटवाया
नक्सलियों का डर दिखाया
डंफर, हाईवा से दर्जनों को कुचलवाया
स्थानीय नेताओं को खरीदा
ठेकेदारों को ठेका देकर मुँह बंद कराया
पत्रकारों को खरीदा
प्रेस के दफ्तर में लाखों का विज्ञापन भिजवाया
सब चुप!
न कोई आवाज उठाता है
न कोई छापता है
सब तुम्हारे दलाल बन गए
क्या कारण है कि
वहां पोस्टिंग करवाने के लिए
एक दारोगा
एक बी.डी.ओ.
एक सी.ओ.
लाखों का रिश्वत तक
अपने आला अधिकारियों को देता है
क्या कारण है कि
यहां के कोयले से बड़े-बड़े शहर रोशन हो रहे हैं
लेकिन यहां के लोगों को
बिजली आज भी नहीं मिली
पानी नहीं मिला,
सड़के नहीं मिली
न स्कूल खुले,
न अस्पताल बना
बल्कि छह सौ से ऊपर
हाईवा डंफर से कुचलकर लोग बेमौत मरे…

नहीं साहेब नहीं
हम अपने गांव को वैसा नहीं बनने देंगे
हम नहीं लेंगे
तुम्हारा मुआवजा,
तुम्हारा पुनर्वास का पैकेज
हमें यही रहने दो
अपनी जड़ों से जुड़कर
इन बांसों के झुरमुटों में
इन पलाश के छांव में
सुस्ताने दो
उन्मुक्त होकर बिचरने दो
इन जंगलों में
गाने दो गीत
अखरा में
मांदर संग-नगाड़ा संग
बांसुरी संग-शहनाई संग …
बचा कर रखने दो हमें
अपनी संस्कृति,
अपनी मान्यता,
अपनी परंपरा
अपने नदी-नाला, पहाड़, जंगल, झरना…
हम तुम्हारा विरोध नहीं कर रहे हैं साहेब
यह देश के विकास के लिए अच्छा है
तुम एक नहीं
सैकड़ों कोलियरी खोलो,
प्लांट लगाओ,
फैक्ट्री खोलो
हमे ऐतराज नहीं है
लेकिन लाशों के ढेर पर तो मत खोलो साहेब
गरीबों को बेदखल करके तो मत खोलो
हमें कहीं और बसा दो और खोल लो
सच साहेब,
पहले हमें हुंडार, सियार, बाघ से डर लगता था
लेकिन अब तुम लोगों को देखकर डर लगता है
जाओ साहेब जाओ
हमें बख्श दो
नया उलगुलान करने पर मजबूर मत करो
‘ठाँय-ठाँय’….
ओ डरा रहे हो बंदूक से-गोलियों से
तेरी भोंसड़ी के
निकालो तो रे तीर-धनुष…
अभी भी कहता हूं
चैन से रहने दे रे हरामजादे…

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